Sunday, 8 January 2017



बात जो दिल को छू जाए

बेंगलुरु में 1 जनवरी को घटी घटना से मैं बेहद आहत हूँ । सीसीटीवी केमरे के उस छेड़खानी दृश्य को देखकर मेरा खून तो नहीं खोल रहा है, मगर उसने मुझे अपनी सभ्यता, संस्कृति और बीमार मानसिकता पर गहराई से सोचने पर विवश जरूर किया है । मेरा खून इस बार इसलिए नहीं खोल रहा है क्योंकि मैंने जबरन इसे खोलने से रोका है, और इसे रोकना भी मुझे युक्तिसंगत लगा । दिल्ली के निर्भया कांड के वक्त भी मेरा खून खूब खोला था । मेरे जैसे कई नैजवानों, एवं संवेदनशील व्यक्तियों ने मिलकर, वहां केंडल मार्च निकाला था। सरकार और प्रशासन दोनों एकाएक, हरकत में आ गई थी । आरोपियों को सलाखों के पीछे डाल दिया गया । उन्हें सजा भी सुना दी गई । मगर क्या लड़कियों अथवा महिलाओं के साथ होनेवाली बलात्कार और छेड़खानी जैसी कुत्सित घटनाएं बंद हो गई ? नहीं, आज भी किसी सुनसान गली, मुहल्ले और बीच सड़कों में आए दिन ऐसी घटनाएं घटती रहती है । हर बार खून खोलता है मगर क्या इससे समाज बदल रहा है । समाज की मानसिकता बदल रही है ? केंडल मार्च को देखकर क्या हैवानियत की बीमार मानसिकता रखने वाले उन दरिंन्दों की आत्मा पसीजती है ? उन्हें अपने किए कराए पर पछतावा होता है ? नहीं, ऐसा हरगिज नहीं होता । अगर ऐसा होता तो फिर दिल्ली के उस निर्भया काण्ड के बाद ऐसी घटनाएं समाज में बार बार नहीं घटती ।
हम भी कितने भोले हैं ना । आधी आबादी पर जब कोई दरिंदगी की घटना घटती है तो हम सीधे केंडल मार्च पर निकल पड़ते हैं । क्या इससे हमारे सभ्य समाज में, हमारे ही बीच, हमारे आसपास रहने वाले उन जानवरों पर कोई असर होने वाला है ? कदापी नहीं । जानवरों को केवल उसी की भाषा में समझाया जाना चाहिए तभी उसके भेजे में इनसानियत की बात घूसेगी ।
लड़कियों के साथ हो रही ऐसी घटनाओं पर, मैंने कुछ वर्षों से पैनी निगाह रखी है और उनके तमाम आरोपियों को देखकर मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि ऐसी घटनाओं को अंजाम देने वाले कोई अलग किस्म के आदमी नहीं होते । वे सब हमारे ही बीच के कोई होते हैं । उनकी कोई अलग बिरादरी नहीं होती, कोई अलग दुनिया नहीं होती । सब हम जैसे लोग ही होते हैं । कोई भी इंसान लडकियों या महिलाओं के लिए कुत्सित भावना लेकर मां की कोख से पैदा नहीं होता । उनकी ऐसी विचारधारा हमारे बीच रहकर ही बनती है । और इसकी शुरुआत छोटी छोटी घटनाओं से होती है ।
आपने भी कभी ना कभी बस में, ट्रेन में, मेट्रों में, हाट-बाजार में, मेले में अथवा बीच सड़क पर देखा होगा कि कुछ मनचले अपने आसपास की लड़कियों पर फब्तियां कस रहे होते हैं । और हम चुपचाप उसे इग्नोर कर आगे बढ़ जाते हैं। ऐसी ही छोटी-छोटी घटनाओं से उन मनचलों का हौसला बुलंद होता है और वही आगे चलकर ऐसी हैवानियत घटनाओं को अंजाम देते हैं ।
मेरा आप सभी से अपील है कि अगर आपके आसपास ऐसी कोई भी छोटी मोटी घटनाएं घटती है तो तुरंत ऐसे मनचलों को अपने मुताबिक वहीं सबक सीखा दीजिए ताकि भविष्य में ऐसी हरकत करने से पहले वह हजार बार सोचेगा । मनचलों के खिलाफ़ हम तुरंत एकज़ूट हो जाएं । अगर कोई जान पहचान वाले ऐसी घटनाओं के बारे में आपके सामने जिक्र करता है तो उसके गालों में वहीं एक जोरदार वाला तमाचा रसीद दीजिए । किसी ने ठीक ही कहा है कि अन्याय करने से भी बड़ा पाप चुपचाप अन्याय को सहना है । और इस प्रकार अगर हम मनचलों को सबक सिखाने का दृढ संकल्प कर लेगें तो मैं पूर्ण दावे के साथ कह सकता हूँ कि भविष्य में ऐसी घटनाओं पर स्वतः लगाम लग जाएंगी ।
जय हिन्द जय भारत    

Saturday, 7 January 2017



प्रिय पाठकों, आपको यह सूचित करते हुए मुझे बेहद खुशी हो रही है कि साल भर के अथक प्रयास के बाद अब जाकर मेरी तमन्ना पूरी हुई । 1 जनवरी 2017 से मेरी पहली पुस्तक अलबेलिया (कहानी संग्रह) अमेज़न पर ऑनलाइन बुकिंग शुरू हो गई है। इसके लिए मैं वीनस जी का एवं उनकी टीम का आभार व्यक्त करता हूँ।

आप सभी से भी मेरा विशेष अनुरोध है कि आप भी #अलबेलिया को मंगवाकर अवश्य पढ़ें और अपनी प्रतिक्रिया से मुझे अवगत कराएं, ताकि भविष्य में और अच्छी अच्छी कहानियों को गढ़ने में मैं सफल हो सकूँ ।
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और शीघ्र ही फ्लिपकार्ट पर भी उपलब्ध हो जाएगी ।
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Thursday, 1 September 2016

क्या हम सही दिशा में आगे बढ़ रहे हैं ?


हम एक ऐसे देश के वासी हैं जहां विविधताओं में भी खूब विविधताएं मिलती हैं. यहां हर रंग हर रूप, हर छांव हर धूप में विविधता पाई जाती है. यही विविधता हमारे जीवन में विविध रंगों की खुशियां घोलती हैं और जीवन को रंगीन बनाती है. हम उदार प्रकृति के अटल उपासक हैं और प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित कर जीते हैं. यही वजह है कि हम आनन्दमय जीवन के सच्चे हकदार हैं. जिस प्रकार मधुमक्खी अपने कार्यों में मगन होकर विविध फूलों के पराग व जल के सम्मिश्रण से हमारे लिए जीवनदायी मधुरस (शहद) तैयार करते हैं ठीक उसी तरह हम लोक कल्याण की भावना के साथ अपने कार्यों में मगन होकर दुनियाभर में ज्ञान का प्रकाश फैलाते हैं. हम ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ की कामना के साथ अपने प्रगति मार्ग पर बढ़ते हैं. हमारी उदारता और सहृदयता ही हमारी पहचान रही है. विश्व कल्याण हमारा धर्म रहा है और जनसेवा हमारी परम्परा. इन्हीं सिद्धांतों के कारण विश्व में हमारी एक अलग पहचान है.
समय बदला लोगों की मानसिकता बदली. बदलाव तो प्रकृति का नियम है. इसे ना हम रोक सकते हैं और ना ही अस्वीकार सकते हैं. किंतु, बदलाव सही दिशा में हो इस बात का ध्यान हम अवश्य रख सकते हैं. आए दिन देशभर में घटित हो रही घटनाओं ने हमें एक बार पुनः आत्मचिंतन एवं आत्मविश्लेषण करने पर मजबूर कर दिया है. अब वक्त आ गया है कि हमें स्वयं से सवाल करना होगा – क्या हम सही दिशा में जा रहे हैं ?
विश्व की अन्य संस्कृतियों से हम काफी प्रभावित होते हैं विशेषकर पाश्चात्य संस्कृति का हमारे ऊपर बहुत गहरा प्रभाव पड़ा है. दिन-ब-दिन हम इस संस्कृति के मूरीद होते जा रहे हैं. वहां के रहन-सहन, खान-पान, भेस-भूषा, बोल-चाल को अपनाकर हम गर्वित होते हैं और स्वयं को अब्बल दर्जे का इंसान समझ बैठते हैं. हम उनके द्वारा प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से थोपे गए उन तमाम चीजों को दिल से अपना लेते हैं किंतु, उनसे हमें जिस चीज को अपनाने की सख्त जरूरत है उसकी ओर हमारा ध्यान ही नहीं जाता है. अगर हमें उनसे कुछ अपनाना है तो बाकि सभी चीजों के केन्द्र में निहीत उनकी देशभक्ति की भावना को अपनाना चाहिए, उनके भाषा प्रेम को अपनाना चाहिए. किंतु, यह हमारे लिए सबसे बड़ी विडम्बना है कि इस ओर हमारा ध्यान ही नहीं जाता है और हम पाश्चात्य संस्कृति के रंग से रंगे हुए देशी सियार बन कर जीने में आनन्द पाते हैं.

जिस दिन हम पाश्चात्य देशों से उनके खान-पान, रहन-सहन, भेस-भूषा और बोल-चाल को किनारे कर उनसे उनका स्वदेश प्रेम तथा भाषा प्रेम की बात सीख जाएंगे उसी दिन से भारत विश्व में अपना गौरव का परचम लहराना आरम्भ कर देगा और एक दिन पुनः विश्व का सिरमोर बन जाएगा.

Wednesday, 24 August 2016


उम्मीदों की कश्ती















टिमटिमाते तारे की रोशनी में
मैंने भी एक सपना देखा है  
टुटे हुए तारे को गिरते देखकर
मैंने भी एक सपना देखा है  
सोचता हूं मन ही मन कभी
काश ! कोई ऐसा रंग होता
जिसे तन-बदन में लगाकर
सपनों के रंग में रंग जाता ।
बाहरी रंग के संसर्ग पाकर
मन भी वैसा रंगीन हो जाता ।
सपनों से जुड़ी है उम्मीदेंपर   
उम्मीदों की उस परिधि को
क्या नाम दूं ? सोचता हूं तो 
मन किसी अनजान भंवर में
दीर्घकाल तक उलझ जाता है।
कोई अनसोची जवाब उभरता
फिर क्षण भर में लुप्त हो जाता है ।   
उम्मीद ही तो वह संजीवनी है
जिसके सहारे सपनों की राह में
आने वाली हर चुनौतियों के आगे
ना कभी मस्तक झुका ना दिल हारा  
उम्मीदों की इसी कश्ती में होकर सवार
मैं सपनों की रंगीन दुनिया ढूंढ निकालूँगा । 

@govind  

Monday, 27 June 2016

मेरी कलम से @ Love Connection - आंख लड़ाई कम्पीटीशन

दुनिया में एक घटना अजीब की होती है जो वर्षों बीत जाने पर भी हमारी यादों की पटरी से नहीं उतरती. दिन, महीने कई वर्ष गुजर जाने पर भी वह दिल के सबसे सुरक्षित भाग में संजीवनी बूटी की तरह सदैव अपनी चिरकालीन हरियाली के साथ लहलहाती रहती है। वह घटना केवल हमारे और आपके साथ ही घटित नहीं होती बल्कि यह घटना तो हर किसी के साथ घटित होती है। कोई उसे सँजोकर अपने दिल की विरासत बना लेते हैं तो कोई उसे भूल जाने का भरपूर स्वांग रचते हैं, पर दिल की बात तो दिल ही जाने।
मेरे साथ यह घटना उस वक्त घटी थी जब मैं 12वीं में पढ़ता था। उस वक्त तक मैं पूर्ण अक्षत था। अक्षत शब्द का दायरा बहुत बड़ा है इसीलिए इस शब्द का प्रयोग मैं यहाँ अपनी मानसिक अवस्था के संदर्भ में कर रहा हूँ। आप इसका गलत अर्थ मत लगा लेना। इस घटना को मैं अजीब इसीलिए भी कहता हूँ क्योंकि यह बिना तैयारी की अचानक घट जाती है और चिरंजीवी बनकर हमारे दिल के एक भाग को हमेशा हमेशा के लिए रिजर्व कर लेती है.
उस दिन मेरे दोस्त कृष्णा के बड़े भाई के तिलक की रस्म थी । दोस्त का घर मेरे पड़ोस में ही था। मैं नियत समय पर शाम को छह बजे उसका घर पहुँच गया। उनके घरवाले तिलक की तैयारी में व्यस्त थे। मैं जैसे ही उसका घर पहुंचा उनके भैया ने मुझे भी कृष्णा के साथ कामों में इंगेज कर दिया। हमारी ड्यूटी लगी थी तिलक के लिए लड़की वालों की तरफ से आए हुए गेस्ट की आव-भगत की देखरेख करने की । हम भी अपने काम में बड़े ही दिल से जुट गए थे । गेस्टहॉल में नाश्ते पानी का इतजाम करवाते वक्त मैंने नोटिस किया कि गेस्ट ग्रुप में एक लड़की भी बैठी हुई है, पर उधर मैंने विशेष ध्यान नहीं दिया। अपनी ज़िम्मेदारी ईमानदारीपूर्वक हम निपटाने में व्यस्त थे।
कुछ देर बाद तिलक का रस्म आरंभ होने वाला था। हमारी ओर से इसकी तैयारी आंगन में पूरी कर ली गई थी। उसी समय लड़की वाले भी आकर वहाँ बैठने लगे। मैं फिर किसी काम के लिए घर के अंदर गया। जब बाहर आया तो सारे लोग आंगन में अपने-अपने स्थान पर बैठ चुके थे। अचानक मेरी नजर उस लड़की पर चली गई ज़ो लड़कीवालों की तरफ से आई थी। ओएमजी ! वह तो डैम ब्युटीफूल थी। गुलाबी सूट में वह जबरदस्त जंच रही थी। उसकी सुंदरता को मैं चोरी नजर से देख ही रहा था कि उसने भी मेरी ओर एक नजर डाल दी। हम दोनों की नजरें आपस में टकरा गई। कुछ वह भी शरमाई थोड़ा मैं भी शरमाया। उसकी आंखे झुक गई, विजय से मेरी आँखें चमक गई।
शादी का दिन आया । मैं बाराती बनकर वहाँ गया था। सबकी नजरें बरमाला की स्टेज पर दुल्हन के लिए बेताब थी पर, वहाँ शायद मैं ही एकलौता था जो दुल्हन की बहन के लिए बेताब था। (बाद में मुझे पता चला कि वह सुंदर बाला दुल्हन की चचेरी बहन थी।) स्टेज पर दुल्हन आई उसके साथ पाँच और बालाएँ थीं। उन्हीं बालाओं के साथ एक बाला वह भी थी जिसके लिए मेरी नजर तरस गई थी। वह वहाँ नीले रंग की साड़ी में थी, इसी वजह से उसे पहचानने में मुझे थोड़ा समय लग गया।
वह तो नीली साड़ी में परियों की रानी लग रही थी। और मैं नीली जींस और व्हाइट सर्ट के ऊपर ब्लैक बंडी में शायरों का राजा । मैं एकटक उसे निहारे जा रहा था। पर वह खुद में ही मदमस्त थी। वरमाला की रस्म पूरी हुई। वह दुल्हन के संग वापस चली गई। मैं उसे देखता रह गया।
मंडप में जब मैं पहुंचा तो वहाँ विवाह आरंभ हो गया था। परियों की वही रानी इस बार पीले रंग की सूट पहने मंडप में बैठी हुई थी। मैंने भी इस बार मौका नहीं गवाने का मन में दृढ़ संकल्प कर लिया। अवसर देखकर मैं उसके ठीक सामने कुछ दूरी पर बैठ गया। अब हम दोनों के बीच बिना किसी व्यवधान के आई कोंटेक्ट हो सकती थी। वही हुआ जिसकी मुझे आस थी। उसने मुझपर एक नजर डाली, तो मैंने भी पूरी तैयारी के साथ उनकी नजरों में अपनी नजरें टीका दी। ये क्या, मैं तो शॉक्ड हो गया। इस बार तो मेरी ही नजरें झुक गई। कुछ देर बाद मैंने अपना खूब दमखम लगाया और उसे अपनी नजरें झुकाने के लिए मजबूर कर दिया। फिर रात भर हमारी आँख लड़ाई की कंपीटीशन चलती रही। कभी मैं हारता कभी वह हारती। लेकिन सच्चाई यही है कि उस कंपीटीशन में अधिकतर बार मैं ही हारा था और पहले मेरी ही आँखें झुकी थी। कसम से ! उस दिन मुझे समझ आया कि लड़कियां आखिरकार कितनी ताकतवर होती है।
सुबह हुआ मैं उससे बात करने के फिराक में लग गया। काफी दांव-पैंच भिड़ाने के बाद आखिरकार एक अवसर मैंने ढूंढ ही निकाला। उसके सामने खड़े एक छोटे से बच्चे को बुलाकर मैंने उसे पीने के लिए पानी लाने की बात की और वह बच्चा सीधे जाकर उसी बाला को यह बात बता दी। वह तुरंत घर के अंदर से एक ग्लास पानी लेकर आई और मुझे दे दी।
मैंने पानी पिया और ग्लास उसे थमाते हुए कहा – थैंक यू ।
उसने कहा – वेलकम।
मैं उससे कुछ पूछता उससे पहले ही वह बोल पड़ी – क्यों रात में तो आप मुझसे हार गए ? बारातियों की तो नाक कटा दी आपने ? है कि नहीं ?
बाराती वैसे भी अपनी अल्हड़ता के लिए बड़े फैमस होते हैं । मैं बाराती बनकर जरूर गया था पर बारातियों वाली अल्हड़ता मुझमें थी नहीं । मेरे हारने की शायद यही एक वजह रही हो ।
मेरी नजर फिर झुक गई । मैंने बस इतना ही कहा – जी ।
उसने अगला सवाल दागा - पहली कंपीटीशन थी ?
मैंने सिर हिलाते हुए कहा - जी ।
चलते-चलते आखिरकार मैंने भी साहस जुटाकर पूछ ही लिया – आपका नाम ?
उसने तपाक से कहा – निशा ।
मैंने कहा – बाय ।
उसने भी दाएँ हाथ हिलाते हुए कहा – बाय ....बाय । 
उसके बाद आजतक उससे ना मेरी कोई बात हुए और ना ही कोई मुलाक़ात। एक दिन कहीं से मुझे पता चला कि उसकी शादी हो गई है और आजकल वह पटना में अपने पति और एक पाँच साल के बेटे के साथ रह रही है।
मैं भी अपनी जिंदगी में खुशहाल हूँ। पर आज भी उस लड़की का वह खूबसूरत चेहरा दिल के एक सुरक्षित कोने में संजीवनी बूटी की तरह अपनी पूर्ण हरियाली के साथ लहलहा रही है। क्योंकि वह मेरी लाइफ की पहली लड़की थी जिसके साथ मेरी नजर लड़ी थी और दिल में कुछ-कुछ हुआ था.  


Wednesday, 30 December 2015

2015 कुछ ऐसे जीया

हम 2015 के अंतिम सप्ताह में देखते ही देखते पहुँच गए हैं. आगे नव वर्ष के आगमन की तैयारी जोरों-शोरों पर है. आप ये मत समझ लेना कि पार्टी, सजाने-उजाने की तैयारी की मैं बात कर रहा हूं. मैं बात कर रहा हूं आगामी वर्ष को अपने मनमुताबिक बिताने की तैयारी के बारे में, कुछ आवश्यक परिवर्तन लाने के बारे में, कुछ आत्म विकास के बारे में और अंततः आपलोगों को कुछ नई-नई बातें बताने के बारे में.
आगामी वर्ष की बातें आगे होगी, फिलहाल हम बातें करेंगे लगभग अंतिम पड़ाव में पहुंच चुके वर्ष 2015 की उपलब्धियों और विशेष गतिविधियों के बारे में. तो आइए जानें वर्ष 2015 मेरे लिए क्या-क्या लेकर आया.
1.       वैवाहिक बंधन में बंधना – 26 फरवरी से मेरे जीवन की एक नई शुरुआत आरम्भ हुई. इस दिन से मेरी जिन्दगी का सफर एक बहुत ही खूबसूरत और समझदार जीवनसंगिनी अंजु के साथ आरम्भ हो गई. शादी के बाद कई ऐसे परिवर्तन मैंने अपने व्यक्तित्व एवं जीवन में अनुभव किया जिन्हें इससे पूर्व अनदेखा कर दिया करता था. सचमुच मैं पहले की तुलना में कहीं ज्यादा संजिदा हो गया हूं.
2.       लेखन की ओर झुकाव – बचपन से ही लिखने का शौक रहा था किंतु, बचपन में परिस्थितियां अनुकूल नहीं रहने की वजह से अपने इस शौक को हकीकत में नहीं बदल पाया था, पर जब परिस्थितियां अनुकूल हुई तो शौक मुर्झाने लगा था. और इस वर्ष के मध्य अचानक कुछ ऐसा हुआ कि मेरे अंदर का शौक एक बार फिर जीवंत हो उठा और मैं लिखने की ओर एक बार फिर जोर शोर से मुड़ गया. वर्ष के अंत तक कई कहानियां लिख डाली और इसका एक संग्रह ‘अलबेलिया’ नाम से प्रकाशनाधीन है. आप इसे खरीदें और मेरे मनोबल को बढ़ाएं.
3.       ब्लॉग लेखन – मई माह से मैंने ‘मेरी कलम से’ नाम से ब्लॉग लेखन का कार्य आरम्भ किया. ब्लॉग लेखन के आरम्भिक दौर में हूं इसीलिए कई बातें और नई नई चीजें मुझे अभी सिखने की जरूरत है. आप इस संदर्भ में कोई अच्छा सुझाव देकर मेरा मार्गदर्शन करना चाहें तो आपका स्वागत है. आगामी वर्ष 2016 से मैं अपना एक नया ब्लॉग ‘Learn And Grow Programme’ के साथ सक्रीय हो जऊंगा. आप इसे फोलो करें, नई – नई जानकारियों से मैं आप सभी को अवगत कराता रहूंगा.
4.       अंग्रेजी सिखना – अपने ज्ञान के दायरे को बढ़ाने के विचार से मैंने हिन्दी के साथ-साथ अंग्रेजी को भी आत्मसात करने का निर्णय लिया है. हालांकि यह निर्णय मैंने वर्ष के अंतिम महीनों में लिया है और मैं अनुभव कर रहा हूं कि इस निर्णय को लेने में मैंने थोड़ी देरे कर दी है. कोई नहीं जब जागा तभी सवेरा. इस दिशा में काफी कार्य किया है और अभी बहुत करना शेष है. समय-समय पर अपनी प्रगति से मैं आप सभी को अवगत कराता रहूंगा.
5.       घुमने फिरने का दौर – जीवन को रोचक बनाने के लिए मैंने इस वर्ष घुमने-फिरने के लिए भी पर्याप्त समय निकाला. इसमें मेरा काफी अच्छा अनुभव रहा. आप सभी को भी मैं इसके लिए सिफारिश करता हूं. ये महत्वपूर्ण नहीं है कि इसके लिए आप विदेश जाएं, या फिर किसी ऐसे स्थानों पर जाएं जो आपके बजट के बाहर हो. अपने आप-पास या नजदिकी क्षेत्रों में भी अपने दोस्तों या फिर परिवार जनों को लेकर घुमने जा सकते है और वहां कम लागत में भी घुमने का भरपूर आनन्द उठा सकते हैं. मैं भी मार्च में अंजु के साथ शिमला (हिमाचल प्रदेश) गया, वहां की बर्फ़बारी और कड़ाके की ठंड का भरपूर मज़ा उठाया. इस ट्रीप में एक और बात यह हुई कि अंजु के लिए हवाई सफ़र का यह पहला अनुभव रहा. इसके बाद हमने कई और जगहों का कार्यक्रम बनाया और इसी दौर में देवघर (झारखण्ड) जाकर बाबा विश्वनाथ के दर्शन किये, मंगलोर (कर्नाटक) के पनम्बूर तट (beach) में खूब अठखेलियां की. चिकमंगलूर (कर्नाटक) में पर्वत घाटी का आनन्द उठाया, मैरिना बीच, चेन्नई (तमिलनाडु) देखा, पांडीचेरी में रॉक बीच, अरविन्दो आश्रम, पैराडाइज बीच का लुत्फ उठाया. वहां मेरे और अंजु के लिए समुद्र में बोटिंग करने का जीवन में पहला अनुभव रहा. वर्ष के अंतिम पड़ाव तक पहुंचते-पहुंचते मडिकेरी (कुर्ग) जाकर कॉफी बगान और कालीमिर्च की खेती देखी और एबी फॉल, राजा सीट, मडिकेरी फोर्ट देखा. मैसूर जाकर मैसूर पैलेस की खूबसूरती और भव्यता देखी और बृन्दावन गार्डेन में खूब मजा किया. अंत में नन्दी हील का भी बड़ा सुखद अनुभव रहा. बेंगलोर के अंतर्गत लालबाग, कबन पार्क, जे.पी. पार्क ईशकॉन टेंपल और बन्नेरघट्टा नैशनल पार्क का भी बहुत ही अच्छा अनुभव रहा. कुल मिलाकर वर्ष भर के घुमने-फिरने का अनुभव बहुत ही खास रहा.
इसके साथ और कई ऐसी बातें हुई जिसे मैं सदैव मधुर स्मृति के रूप में संजोकर रखना चाहूंगा. इस दौरान कई ऐसी बातें भी हुई जिसे मैं कभी स्मरण भी करना नहीं चाहूंगा. छोटी-बड़ी कई सफलताएं मिली और कई असफलताएं भी हाथ लगी. कई नए दोस्त बने और नए अनुभव मिले.

इस तरह मिली-जुली परिणामों के साथ वर्ष 2015 बीत गया. नव वर्ष द्वार तक आ पहुंचा है. नववर्ष के स्वागत के लिए मैं भी मानसिक रूप से तैयार हूं. कुछ नई बातें सिखने और सिखाने का दौर Learn And Grow Programme के साथ आरम्भ करने जा रहा हूं. आप सभी मुझसे जुड़े रहें और मेरे साथ नए सफ़र का अनुभव साझा करते रहें. 

आगामी post Learn And Grow Programme के साथ