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Wednesday, 15 February 2017

khatti mitthi baat

अलबेलिया एक कहानी संग्रह। ज्यादा सोच विचार न करें, मैंने ही लिखी है। कुल बारह कहानियां है इसमें, एकदम कचरस कहानियां,  इसीलिए तो कह रहा हूँ मजा खूब आएगा। कई चीजें है इसमें उन्हीं के बेसिस पर मैं रिकमेंड कर रहा हूँ कि आप भी एक बार इसे जरूर पढ़ें। मजा आए तो govindpandit0304@gmail.com पर एक मेल छोड़ देना और अगर मजा नहीं आए तो…..तो…..तो दोस्त के नाते कह देना “स्साला बकवास किताब लिखी है” ठीक वैसे ही जैसे क़ोई बकवास मूवी देखकर हॉल से लिकलते ही उगल देते हो “एकदम बकवास” । बड़े होने के नाते कह दीजिएगा “बाबू थोड़ी और मेहनत से लिखा करो” और गुरु होने के नाते सारी कमियाँ गिन-गिन कर लिख भेजिएगा।
ये हुई जेनेरल बात मगर अब मैं बताने जा रहा हूँ क़ि अलबेलिया क्यों पढ़ें। इस किताब की ख़ासियत क्या है ? बाकी किताबों से यह अलग क्यों है ? दरअसल न, क्या बताएं क़ि इसकी खासियत क्या है मगर फिर भी दो टूक इसपर बतकही करें तभी तो आप जान पाएंगे कि इसमें क्या खास रखी हुई है। इसकी कहानियां एकदम अलग अलग खेमे से है। अलग अलग धरातल है। अलग अलग परिवेश है , अलग अलग किस्म के पात्र है मगर फिर भी सबमें जो कॉमन बात है वह है इनका जुझारूपन । सभी पात्र अपने हिस्से की जिंदगी में जूझता हुआ नजर आएगा और आपको अहसास कराएगा कि जिंदगी का असली मजा तो जूझने में है न कि हार मानकर बैठ जाने में।
इनकी सारी कहानियां नई हिंदी में लिखी गई है। नई हिंदी मतलब समझते हैं न। आम बोलचाल वाली हिंदी । यहां ना कोई पांडित्य प्रदर्शन है और ना ही कोई लाग लपेट। एकदम सरल सुबोध वाली हिंदी, हंसते हंसते आप इसे ऐसे पढ़ जाइएगा जैसे मूवी देखते वक्त लोग पोपकोर्न रपट लेते हैं । ना शब्दों के अर्थ ढूंढने के लिए आपको किसी हिंदी शब्दकोश की जरुरत होगी और ना ही आपके कपार में क़ोई सिकन आएगा। कहानियों में भाषा की सहजता बनाए रखने के लिए आम बोलचाल में प्रयोग होने वाले अंग्रेजी शब्दों का भी बीच बीच में प्रयोग किया गया है, किन्तु यहां इस बात का ख़ास ख्याल रखा गया है कि हिंदी का अप्रतिम रूप सौन्दर्य विकृत ना हो इसके लिए अंग्रेजी शब्दों को देवनागरी लिपि में ही लिखी गयी है। कुछ लेखक ऐसे भी देखा देखी में उभर कर आ रहे हैं जो अंग्रेजी शब्दों को रोमन लिपि में ही जबरन हिंदी में घुसेड़ रहे हैं और हिंदी के विकृत रूप को नया प्रयोग कहते है। अगर आप ऐसे विकृत हिंदी को पढ़ने की लालच पाले हुए हैं तो यहां आपको थोड़ी निराशा हाथ लगने वाली है।  
नई वाली हिंदी में शब्दों की भोंडापन का भी एक अलग दौर चल पड़ा है । कुछ लोग पाठकों का मनोरंजन अपनी लेखन कला से कहीं ज्यादा अपने शब्दों के भोंडेपन से करना चाहते है,  किन्तु यहाँ आपको किसी भी प्रकार की अनावश्यक शाब्दिक भोंडापन नहीं मिलनेवाला है। हाँ एक बात जरूर है कि कॉलेज के स्टूडेंट्स के वार्तालाप को स्वाभाविक बनाए रखने के लिए कुछ सेमी नानवेज शब्दों का प्रयोग जरूर किया गया है। मगर शब्द भी ऐसे हैं कि आपको ज्यादा अखरेगा नहीं और ना ही किसी प्रकार का आपका मानसिक सिलभंग करेगा।
ये तो हुई आधी बात पूरी बात आपको तब समझ में आयेगी जब आप अलबेलिया की कहानियों को पढ़ेंगे।

चलिए आज के लिए इतना ही बाकी फिर कभी बताएँगे ।

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Wednesday, 8 February 2017

सोचबंदी
आजकल देश भर में नोटबंदी का गहमागहमी चल रही है । कुछ लोग इसे सही कदम बता रहे हैं तो कुछ गलत कदम। यह कदम सही है या फिर गलत यह तो राजनीति का विषय है किंतु, इसके पीछे जो ध्येय है वही हमारे लिए सबसे अहम है।
नोटबंदी के पीछे मुख्य ध्येय बाजार में चल रहे जाली नोट एवं काला धन का खात्मा कर एक स्वच्छ अर्थव्यवस्था को स्थापित करना है । यही बात सबसे अहम है। जाली नोटों एवं काला धन से देश की अर्थव्यवस्था में अनेक प्रकार की विसंगतियां आ गई थी जो देश के लिए हानिकारक था इसीलिए नोटबंदी का ऐलान कर उन विसंगतियों को समूल नष्ट करने का प्रयास किया गया है । ये तो हुई राजनीति की बात, मगर मैं यहां राजनीति से इत्तर आत्मनीति की बात करने वाला हूँ ।
आत्मनीति में सोचबंदी एक अहम मुद्दा है । जब हम आत्मनीति अर्थात आत्मविकास की बात करें तो विचार, चिंतन, सोच ही वह मूल है जिसके सहारे हम अपना विकास कर सकते है। किसी भी व्यक्ति के जीवन में उसकी कामयाबी अथवा नाकामयाबी में सबसे अहम रोल उसकी सोच की ही होती है । आप इतिहास के हर पन्नों पर पाएंगे कि अगर कोई व्यक्ति महान बना है तो केवल अपनी सोच की वजह से, अगर किसी के जीवन में चमत्कारिक परिवर्तन हुआ है तो मात्र उसकी सोच की वजह से, किसी ने अगर आसमान की बुलंदियों को छूआ है तो मात्र अपनी सोच की वजह से। सोच ही तो है जो देश में क्रांति लाती है, सोच ही तो है जिसने मानव को मानव बनाया है ।
अगर इतिहास के पन्नों में झांककर देखें तो हमें साफ़ दिखाई पड़ता है कि तुलसीदास हो या कालिदास वे तबतक सामान्य व्यक्ति थे जबतक कि उनकी सोच नहीं बदली थी। महानता की राह में उनके कदम तब आगे बढ़े जब अपनी पत्नियों द्वारा वे दुत्कारे गए और उसके  बाद उनकी सोच में एकाएक परिवर्तन आ गया । जैसे ही उनकी सोच आम से खास होने लगी वैसे ही उनका व्यक्तित्व भी आम से खास होता गया ।  
इसीलिए सोच या विचार का हमारे सम्पूर्ण व्यक्तित्व पर बहुत गहरा प्रभाव होता है। अब यहां सवाल उठता है कि सोच या विचार तक तो बात ठीक थी किंतु, सोचबंदी का फंडा आखिर में क्या है ?
आइए मैं आपको प्रैक्टिकली समझाता हूं कि सोचबंदी की आवश्यकता क्यों ? विचार को अगर क्लासिफाई किया जाए तो इसे दो वर्गों में रखा जा सकता है – सकारात्मक विचार एवं नकारात्मक विचार। नकारात्मक विचार को तो जितना जल्दी सम्भव हो सके अलविदा कह दीजिए । अब रहा सकारात्मक विचार – इसके भी दो वर्ग हो जाते हैं – आवश्यक सकारात्मक विचार और अनावश्यक सकारात्मक विचार।
अनावश्यक सकारात्मक विचार भी हमारे लिए नुकसानदेह साबित होता है और हमारा बहुमूल्य समय तो नष्ट करता ही है साथ ही, जीवन को भी अव्यवस्थित कर देता है । इसे एक उदाहरण द्वारा समझने का प्रयास करते हैं । मान लीजिए किसी कार्य से आपने अपने रिलेटिव्स, पेरेंट्स, बिलॉव्ड अथवा बोस को नाराज कर दिया हो । सामने वाले की नाराजगी से आप यह तो जान गए हैं कि यह आपकी मिस्टेक्स थी और उसे लेकर आपके मन में खेद भी है । आप जानते हैं कि इसके लिए आपको सामनेवाले से मांफी माँग लेनी चाहिए । यह एक सकारात्मक विचार है । और यह कुछ पल के लिए आवश्यक सकारात्मक विचार है किंतु, आप मांफी मांगने से हिचक रहे होते हैं । अपनी गलती के लिए मांफी मांगने का साहस आपमें नहीं है तो मांफी मांगने का यही विचार आपको परेशान करने लगेगा और आगे चलकर यह अनावश्यक सकारात्मक विचार का रूप धारण कर लेगा, जो आपका समय और मानसिक शांति दोनों को प्रभावित करेगा।
इसीलिए ऐसे अनावश्यक सकारात्मक सोच की बंदी आवश्यक हो जाती है । आप पूरे जोरदार तरीके से अनावश्यक विचारों पर प्रहार करें और मानसिक रूप से उसकी बंदी का ऐलान कर दें। आप जैसे जैसे इस कला में माहिर होते जाएंगे वैसे वैसे आपके व्यक्तित्व में भी निखार आता जाएगा ।      



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Sunday, 8 January 2017



बात जो दिल को छू जाए

बेंगलुरु में 1 जनवरी को घटी घटना से मैं बेहद आहत हूँ । सीसीटीवी केमरे के उस छेड़खानी दृश्य को देखकर मेरा खून तो नहीं खोल रहा है, मगर उसने मुझे अपनी सभ्यता, संस्कृति और बीमार मानसिकता पर गहराई से सोचने पर विवश जरूर किया है । मेरा खून इस बार इसलिए नहीं खोल रहा है क्योंकि मैंने जबरन इसे खोलने से रोका है, और इसे रोकना भी मुझे युक्तिसंगत लगा । दिल्ली के निर्भया कांड के वक्त भी मेरा खून खूब खोला था । मेरे जैसे कई नैजवानों, एवं संवेदनशील व्यक्तियों ने मिलकर, वहां केंडल मार्च निकाला था। सरकार और प्रशासन दोनों एकाएक, हरकत में आ गई थी । आरोपियों को सलाखों के पीछे डाल दिया गया । उन्हें सजा भी सुना दी गई । मगर क्या लड़कियों अथवा महिलाओं के साथ होनेवाली बलात्कार और छेड़खानी जैसी कुत्सित घटनाएं बंद हो गई ? नहीं, आज भी किसी सुनसान गली, मुहल्ले और बीच सड़कों में आए दिन ऐसी घटनाएं घटती रहती है । हर बार खून खोलता है मगर क्या इससे समाज बदल रहा है । समाज की मानसिकता बदल रही है ? केंडल मार्च को देखकर क्या हैवानियत की बीमार मानसिकता रखने वाले उन दरिंन्दों की आत्मा पसीजती है ? उन्हें अपने किए कराए पर पछतावा होता है ? नहीं, ऐसा हरगिज नहीं होता । अगर ऐसा होता तो फिर दिल्ली के उस निर्भया काण्ड के बाद ऐसी घटनाएं समाज में बार बार नहीं घटती ।
हम भी कितने भोले हैं ना । आधी आबादी पर जब कोई दरिंदगी की घटना घटती है तो हम सीधे केंडल मार्च पर निकल पड़ते हैं । क्या इससे हमारे सभ्य समाज में, हमारे ही बीच, हमारे आसपास रहने वाले उन जानवरों पर कोई असर होने वाला है ? कदापी नहीं । जानवरों को केवल उसी की भाषा में समझाया जाना चाहिए तभी उसके भेजे में इनसानियत की बात घूसेगी ।
लड़कियों के साथ हो रही ऐसी घटनाओं पर, मैंने कुछ वर्षों से पैनी निगाह रखी है और उनके तमाम आरोपियों को देखकर मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि ऐसी घटनाओं को अंजाम देने वाले कोई अलग किस्म के आदमी नहीं होते । वे सब हमारे ही बीच के कोई होते हैं । उनकी कोई अलग बिरादरी नहीं होती, कोई अलग दुनिया नहीं होती । सब हम जैसे लोग ही होते हैं । कोई भी इंसान लडकियों या महिलाओं के लिए कुत्सित भावना लेकर मां की कोख से पैदा नहीं होता । उनकी ऐसी विचारधारा हमारे बीच रहकर ही बनती है । और इसकी शुरुआत छोटी छोटी घटनाओं से होती है ।
आपने भी कभी ना कभी बस में, ट्रेन में, मेट्रों में, हाट-बाजार में, मेले में अथवा बीच सड़क पर देखा होगा कि कुछ मनचले अपने आसपास की लड़कियों पर फब्तियां कस रहे होते हैं । और हम चुपचाप उसे इग्नोर कर आगे बढ़ जाते हैं। ऐसी ही छोटी-छोटी घटनाओं से उन मनचलों का हौसला बुलंद होता है और वही आगे चलकर ऐसी हैवानियत घटनाओं को अंजाम देते हैं ।
मेरा आप सभी से अपील है कि अगर आपके आसपास ऐसी कोई भी छोटी मोटी घटनाएं घटती है तो तुरंत ऐसे मनचलों को अपने मुताबिक वहीं सबक सीखा दीजिए ताकि भविष्य में ऐसी हरकत करने से पहले वह हजार बार सोचेगा । मनचलों के खिलाफ़ हम तुरंत एकज़ूट हो जाएं । अगर कोई जान पहचान वाले ऐसी घटनाओं के बारे में आपके सामने जिक्र करता है तो उसके गालों में वहीं एक जोरदार वाला तमाचा रसीद दीजिए । किसी ने ठीक ही कहा है कि अन्याय करने से भी बड़ा पाप चुपचाप अन्याय को सहना है । और इस प्रकार अगर हम मनचलों को सबक सिखाने का दृढ संकल्प कर लेगें तो मैं पूर्ण दावे के साथ कह सकता हूँ कि भविष्य में ऐसी घटनाओं पर स्वतः लगाम लग जाएंगी ।
जय हिन्द जय भारत    

Saturday, 7 January 2017



प्रिय पाठकों, आपको यह सूचित करते हुए मुझे बेहद खुशी हो रही है कि साल भर के अथक प्रयास के बाद अब जाकर मेरी तमन्ना पूरी हुई । 1 जनवरी 2017 से मेरी पहली पुस्तक अलबेलिया (कहानी संग्रह) अमेज़न पर ऑनलाइन बुकिंग शुरू हो गई है। इसके लिए मैं वीनस जी का एवं उनकी टीम का आभार व्यक्त करता हूँ।

आप सभी से भी मेरा विशेष अनुरोध है कि आप भी #अलबेलिया को मंगवाकर अवश्य पढ़ें और अपनी प्रतिक्रिया से मुझे अवगत कराएं, ताकि भविष्य में और अच्छी अच्छी कहानियों को गढ़ने में मैं सफल हो सकूँ ।
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और शीघ्र ही फ्लिपकार्ट पर भी उपलब्ध हो जाएगी ।
Motivational लेख के लिए आप विजिट कर सकते है @ www.pravachanom.blogspot.com


Thursday, 1 September 2016

क्या हम सही दिशा में आगे बढ़ रहे हैं ?


हम एक ऐसे देश के वासी हैं जहां विविधताओं में भी खूब विविधताएं मिलती हैं. यहां हर रंग हर रूप, हर छांव हर धूप में विविधता पाई जाती है. यही विविधता हमारे जीवन में विविध रंगों की खुशियां घोलती हैं और जीवन को रंगीन बनाती है. हम उदार प्रकृति के अटल उपासक हैं और प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित कर जीते हैं. यही वजह है कि हम आनन्दमय जीवन के सच्चे हकदार हैं. जिस प्रकार मधुमक्खी अपने कार्यों में मगन होकर विविध फूलों के पराग व जल के सम्मिश्रण से हमारे लिए जीवनदायी मधुरस (शहद) तैयार करते हैं ठीक उसी तरह हम लोक कल्याण की भावना के साथ अपने कार्यों में मगन होकर दुनियाभर में ज्ञान का प्रकाश फैलाते हैं. हम ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ की कामना के साथ अपने प्रगति मार्ग पर बढ़ते हैं. हमारी उदारता और सहृदयता ही हमारी पहचान रही है. विश्व कल्याण हमारा धर्म रहा है और जनसेवा हमारी परम्परा. इन्हीं सिद्धांतों के कारण विश्व में हमारी एक अलग पहचान है.
समय बदला लोगों की मानसिकता बदली. बदलाव तो प्रकृति का नियम है. इसे ना हम रोक सकते हैं और ना ही अस्वीकार सकते हैं. किंतु, बदलाव सही दिशा में हो इस बात का ध्यान हम अवश्य रख सकते हैं. आए दिन देशभर में घटित हो रही घटनाओं ने हमें एक बार पुनः आत्मचिंतन एवं आत्मविश्लेषण करने पर मजबूर कर दिया है. अब वक्त आ गया है कि हमें स्वयं से सवाल करना होगा – क्या हम सही दिशा में जा रहे हैं ?
विश्व की अन्य संस्कृतियों से हम काफी प्रभावित होते हैं विशेषकर पाश्चात्य संस्कृति का हमारे ऊपर बहुत गहरा प्रभाव पड़ा है. दिन-ब-दिन हम इस संस्कृति के मूरीद होते जा रहे हैं. वहां के रहन-सहन, खान-पान, भेस-भूषा, बोल-चाल को अपनाकर हम गर्वित होते हैं और स्वयं को अब्बल दर्जे का इंसान समझ बैठते हैं. हम उनके द्वारा प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से थोपे गए उन तमाम चीजों को दिल से अपना लेते हैं किंतु, उनसे हमें जिस चीज को अपनाने की सख्त जरूरत है उसकी ओर हमारा ध्यान ही नहीं जाता है. अगर हमें उनसे कुछ अपनाना है तो बाकि सभी चीजों के केन्द्र में निहीत उनकी देशभक्ति की भावना को अपनाना चाहिए, उनके भाषा प्रेम को अपनाना चाहिए. किंतु, यह हमारे लिए सबसे बड़ी विडम्बना है कि इस ओर हमारा ध्यान ही नहीं जाता है और हम पाश्चात्य संस्कृति के रंग से रंगे हुए देशी सियार बन कर जीने में आनन्द पाते हैं.

जिस दिन हम पाश्चात्य देशों से उनके खान-पान, रहन-सहन, भेस-भूषा और बोल-चाल को किनारे कर उनसे उनका स्वदेश प्रेम तथा भाषा प्रेम की बात सीख जाएंगे उसी दिन से भारत विश्व में अपना गौरव का परचम लहराना आरम्भ कर देगा और एक दिन पुनः विश्व का सिरमोर बन जाएगा.

Wednesday, 30 December 2015

2015 कुछ ऐसे जीया

हम 2015 के अंतिम सप्ताह में देखते ही देखते पहुँच गए हैं. आगे नव वर्ष के आगमन की तैयारी जोरों-शोरों पर है. आप ये मत समझ लेना कि पार्टी, सजाने-उजाने की तैयारी की मैं बात कर रहा हूं. मैं बात कर रहा हूं आगामी वर्ष को अपने मनमुताबिक बिताने की तैयारी के बारे में, कुछ आवश्यक परिवर्तन लाने के बारे में, कुछ आत्म विकास के बारे में और अंततः आपलोगों को कुछ नई-नई बातें बताने के बारे में.
आगामी वर्ष की बातें आगे होगी, फिलहाल हम बातें करेंगे लगभग अंतिम पड़ाव में पहुंच चुके वर्ष 2015 की उपलब्धियों और विशेष गतिविधियों के बारे में. तो आइए जानें वर्ष 2015 मेरे लिए क्या-क्या लेकर आया.
1.       वैवाहिक बंधन में बंधना – 26 फरवरी से मेरे जीवन की एक नई शुरुआत आरम्भ हुई. इस दिन से मेरी जिन्दगी का सफर एक बहुत ही खूबसूरत और समझदार जीवनसंगिनी अंजु के साथ आरम्भ हो गई. शादी के बाद कई ऐसे परिवर्तन मैंने अपने व्यक्तित्व एवं जीवन में अनुभव किया जिन्हें इससे पूर्व अनदेखा कर दिया करता था. सचमुच मैं पहले की तुलना में कहीं ज्यादा संजिदा हो गया हूं.
2.       लेखन की ओर झुकाव – बचपन से ही लिखने का शौक रहा था किंतु, बचपन में परिस्थितियां अनुकूल नहीं रहने की वजह से अपने इस शौक को हकीकत में नहीं बदल पाया था, पर जब परिस्थितियां अनुकूल हुई तो शौक मुर्झाने लगा था. और इस वर्ष के मध्य अचानक कुछ ऐसा हुआ कि मेरे अंदर का शौक एक बार फिर जीवंत हो उठा और मैं लिखने की ओर एक बार फिर जोर शोर से मुड़ गया. वर्ष के अंत तक कई कहानियां लिख डाली और इसका एक संग्रह ‘अलबेलिया’ नाम से प्रकाशनाधीन है. आप इसे खरीदें और मेरे मनोबल को बढ़ाएं.
3.       ब्लॉग लेखन – मई माह से मैंने ‘मेरी कलम से’ नाम से ब्लॉग लेखन का कार्य आरम्भ किया. ब्लॉग लेखन के आरम्भिक दौर में हूं इसीलिए कई बातें और नई नई चीजें मुझे अभी सिखने की जरूरत है. आप इस संदर्भ में कोई अच्छा सुझाव देकर मेरा मार्गदर्शन करना चाहें तो आपका स्वागत है. आगामी वर्ष 2016 से मैं अपना एक नया ब्लॉग ‘Learn And Grow Programme’ के साथ सक्रीय हो जऊंगा. आप इसे फोलो करें, नई – नई जानकारियों से मैं आप सभी को अवगत कराता रहूंगा.
4.       अंग्रेजी सिखना – अपने ज्ञान के दायरे को बढ़ाने के विचार से मैंने हिन्दी के साथ-साथ अंग्रेजी को भी आत्मसात करने का निर्णय लिया है. हालांकि यह निर्णय मैंने वर्ष के अंतिम महीनों में लिया है और मैं अनुभव कर रहा हूं कि इस निर्णय को लेने में मैंने थोड़ी देरे कर दी है. कोई नहीं जब जागा तभी सवेरा. इस दिशा में काफी कार्य किया है और अभी बहुत करना शेष है. समय-समय पर अपनी प्रगति से मैं आप सभी को अवगत कराता रहूंगा.
5.       घुमने फिरने का दौर – जीवन को रोचक बनाने के लिए मैंने इस वर्ष घुमने-फिरने के लिए भी पर्याप्त समय निकाला. इसमें मेरा काफी अच्छा अनुभव रहा. आप सभी को भी मैं इसके लिए सिफारिश करता हूं. ये महत्वपूर्ण नहीं है कि इसके लिए आप विदेश जाएं, या फिर किसी ऐसे स्थानों पर जाएं जो आपके बजट के बाहर हो. अपने आप-पास या नजदिकी क्षेत्रों में भी अपने दोस्तों या फिर परिवार जनों को लेकर घुमने जा सकते है और वहां कम लागत में भी घुमने का भरपूर आनन्द उठा सकते हैं. मैं भी मार्च में अंजु के साथ शिमला (हिमाचल प्रदेश) गया, वहां की बर्फ़बारी और कड़ाके की ठंड का भरपूर मज़ा उठाया. इस ट्रीप में एक और बात यह हुई कि अंजु के लिए हवाई सफ़र का यह पहला अनुभव रहा. इसके बाद हमने कई और जगहों का कार्यक्रम बनाया और इसी दौर में देवघर (झारखण्ड) जाकर बाबा विश्वनाथ के दर्शन किये, मंगलोर (कर्नाटक) के पनम्बूर तट (beach) में खूब अठखेलियां की. चिकमंगलूर (कर्नाटक) में पर्वत घाटी का आनन्द उठाया, मैरिना बीच, चेन्नई (तमिलनाडु) देखा, पांडीचेरी में रॉक बीच, अरविन्दो आश्रम, पैराडाइज बीच का लुत्फ उठाया. वहां मेरे और अंजु के लिए समुद्र में बोटिंग करने का जीवन में पहला अनुभव रहा. वर्ष के अंतिम पड़ाव तक पहुंचते-पहुंचते मडिकेरी (कुर्ग) जाकर कॉफी बगान और कालीमिर्च की खेती देखी और एबी फॉल, राजा सीट, मडिकेरी फोर्ट देखा. मैसूर जाकर मैसूर पैलेस की खूबसूरती और भव्यता देखी और बृन्दावन गार्डेन में खूब मजा किया. अंत में नन्दी हील का भी बड़ा सुखद अनुभव रहा. बेंगलोर के अंतर्गत लालबाग, कबन पार्क, जे.पी. पार्क ईशकॉन टेंपल और बन्नेरघट्टा नैशनल पार्क का भी बहुत ही अच्छा अनुभव रहा. कुल मिलाकर वर्ष भर के घुमने-फिरने का अनुभव बहुत ही खास रहा.
इसके साथ और कई ऐसी बातें हुई जिसे मैं सदैव मधुर स्मृति के रूप में संजोकर रखना चाहूंगा. इस दौरान कई ऐसी बातें भी हुई जिसे मैं कभी स्मरण भी करना नहीं चाहूंगा. छोटी-बड़ी कई सफलताएं मिली और कई असफलताएं भी हाथ लगी. कई नए दोस्त बने और नए अनुभव मिले.

इस तरह मिली-जुली परिणामों के साथ वर्ष 2015 बीत गया. नव वर्ष द्वार तक आ पहुंचा है. नववर्ष के स्वागत के लिए मैं भी मानसिक रूप से तैयार हूं. कुछ नई बातें सिखने और सिखाने का दौर Learn And Grow Programme के साथ आरम्भ करने जा रहा हूं. आप सभी मुझसे जुड़े रहें और मेरे साथ नए सफ़र का अनुभव साझा करते रहें. 

आगामी post Learn And Grow Programme के साथ 










Sunday, 20 December 2015

एक बदलाव करें.

कई दिनों से मैं जीवन में जरा उबाऊ-सा महसूस कर रहा था. लाइफ नीरस लग रही थी. मन में कई विचार उमड़-घुमड़ रहे थे. कुछ करना है. कुछ करना है. बस सोच का ही घोड़ा दौड़ रहा था. इस दौरान कई ऐसे कार्यक्रम दिमाग में आए जिसे कार्यांवित करने के लिए मैं उद्विग्न हो रहा था. कुछ दिन गुजरते ही सारे उत्साह शिथिल पड़ जाते. मन के उत्साह, जोश फिर वहीं आकर अटक जाते जहां से शुरुआत हुई थी. कई कार्यक्रम तय किया किंतु, उन्हें धरातल पर उतार नहीं पाया. कार्यों को अंजाम तक नहीं पहुंचा पाने के कारण मन खिन्नता से भर जाता है और खुद को हतोत्साहित महसूस करता हूं.

किंतु, आज मैंने परिवर्तन की शुरुआत करने का ठान लिया है. आज की शुरुआत मैंने कार्यालय आधे घंटे पहले आकर किया है. अक्सर मैं एक्जेक्ट समय पर कार्यालय पहुंचने के लिए निकलता था. बेतहाशा दौड़ पड़ता था. ट्रेफिक के सिग्नल को मौका मिलते ही अक्सर तोड़ कर आगे निकलने के फिराक में रहता था. इसी वजह से कई बार दुर्घटना होते-होते बची. एक बार बचते – बचते एक दुर्घटना हो गई और मेरी नई गाड़ी के कई पार्ट्स टुट गए. उन्हें रिप्लेस कराना पड़ा. और मन में डर भी घर कर गया.

आज की इस नई शुरुआत से मुझे अहसास हुआ कि पहले मैं कितना गलत था. आज मैं बड़ी आसानी से आधे घंटे पहले कार्यालय पहुंच गया. ना मुझे किसी भागमभाग का हिस्सा बनना पड़ा और ना ही किसी तरह की कोई हड़बड़ी मन में थी. इस दौरान ट्रेफिक भी कम मिला. समय की भी बचत हुई और पेट्रोल भी कम जले. राइडिंग का पूरा मजा लेते हुए कार्यालय पहुंच गया और दिनभर का कार्यक्रम भी ऑफिस का कार्य आरम्भ करने से पहले ही पूरा कर लिया. मन को एक तरह की तसल्ली भी मिली.

इस पहल को मैं अपने जीवन का एक अंग बनाने का प्रयास करूंगा. आप भी, इस तरह की शुरुआत कर सकते हैं और भारी ट्रेफिक की मुसीबत से बच सकते हैं. बेतहाशा दौड़ती हुई जीवन की गाड़ी पर अपना नियंत्रण स्थापित कर सकते हैं. गाड़ी के फ्यूल बचा सकते हैं और कुछ हो ना हो किंतु रास्ते में आप बेफिक्र होकर गाड़ी चला सकते हैं और इसका भरपूर आनन्द उठा सकते हैं.

फिलहाल मैं इतना ही कहूंगा कि आप भी आज कोई नई शुरुआत करें जो आपके जीवन के लिए अथवा दिनचर्या के लिए फायदेमंद हो. उसे कायम रखें और ऐसी आदत को जीवन का एक अंग बना लें. आपको लाभ मिलेगा.

आगे मैं आपको बताऊंगा कि इस शुरुआत से मुझे क्या लाभ मिला और आपको भी ऐसे छोटे-छोटे बदलाव से क्या लाभ मिलनेवाला है.

बहरहाल, आप मुझसे जुड़े रहें और Learn And Grow Programe  का सक्रीय हिस्सा बनें.  


Learn And Grow Programe  के बारे मैं आपसे विस्तृत चर्चा मैं शीघ्र ही करूंगा. Plz be in touch. 


+Zen Habits Read Aloud




Wednesday, 16 December 2015

क्या पढ़े, क्यों पढ़े

कई दिनों से मैं एक गहन आत्ममंथन के दौर से चल रहा था. तय नहीं कर पा रहा था कि आखिर मैं क्या कर रहा हूं और वास्तव मैं क्या करना चाहता हूं. यही प्रश्न बार-बार मेरे दृष्टिपटल पर उभरता रहा मिटता रहा. कुछ पढ़ता रहा, कुछ सोचता रहा. इसी दौरान पढ़ते-पढ़ते मैं गलती से ही मगर Leo Babauta  के ब्लॉग Zen habits में जा घुसा. उसे पढ़ता रहा, समझता रहा और अपने व्यावहारिक जीवन में उतारने का प्रयास करता रहा. इसमें कहां तक मैं सफल हुआ यह आपको मैं बाद मैं बताऊंगा, और साथा ही यह भी बताऊंगा कि उनसे प्रेरित होकर मैं क्या करने जा रहा हूं.
बहरहाल, अगर आपके पास भी थोड़ा समय अतिरिक्त है तो इस मेरे साथ जुड़ें और आपको भी भी मैं कई नई-नई बातों से अवगत कराऊंगा और आपके जीवन में भी सकारात्मक बदलाव लाने का प्रयास करूंगा.
 http://zenhabits.net