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Wednesday, 24 August 2016

उम्मीदों की कश्ती















टिमटिमाते तारे की रोशनी में
मैंने भी एक सपना देखा है  
टुटे हुए तारे को गिरते देखकर
मैंने भी एक सपना देखा है  
सोचता हूं मन ही मन कभी
काश ! कोई ऐसा रंग होता
जिसे तन-बदन में लगाकर
सपनों के रंग में रंग जाता ।
बाहरी रंग के संसर्ग पाकर
मन भी वैसा रंगीन हो जाता ।
सपनों से जुड़ी है उम्मीदेंपर   
उम्मीदों की उस परिधि को
क्या नाम दूं ? सोचता हूं तो 
मन किसी अनजान भंवर में
दीर्घकाल तक उलझ जाता है।
कोई अनसोची जवाब उभरता
फिर क्षण भर में लुप्त हो जाता है ।   
उम्मीद ही तो वह संजीवनी है
जिसके सहारे सपनों की राह में
आने वाली हर चुनौतियों के आगे
ना कभी मस्तक झुका ना दिल हारा  
उम्मीदों की इसी कश्ती में होकर सवार
मैं सपनों की रंगीन दुनिया ढूंढ निकालूँगा । 

@govind  

Saturday, 17 October 2015

मन बार-बार रोता रहा

मन बार-बार रोता रहा
जीने की सूध हर बार खोता रहा,
नयन तो टिकी थी, उसके आने की राह में
पर क्या पता,
 उस राह में कोई नफ़रत के कांटे बोता रहा.
मानता हूं,
एक खता तो हुई थी मुझसे भी, ए जिन्दगी,
किसी के सपने जुड़े थे मुझसे भी, ए जिन्दगी,
पर क्या पता,
पल भर में वह रूठ जाएगी मुझसे भी, ए जिन्दगी.
राह जिन्दगी का यूं बदल लेगी मुझसे भी, ए जिन्दगी.
तड़पकर उसकी याद में,
तलब से मगर, हर बार यादों के दीये जलाता रहा

और दिल को रुलाता रहा, मन को समझाता रहा. 

Tuesday, 23 June 2015

चिड़िया

चिड़िया

चिड़िया रानी चिड़िया रानी
मुझे तू लगती बड़ी सुहानी

पेड़ों पर खूब मजे से रहती है
सुन्दर सुन्दर घोंसला बनाती है
गगन में पंख फैलाकर उड़ती है
थककर पेड़ों पर आ बैठती है
नानी सुनाती तेरी सुन्दर कहानी

चिड़िया रानी चिड़िया रानी
मुझे तू लगती बड़ी सुहानी

            दिनभर दाना चुन चुन लाती है
            नन्हें नन्हें बच्चों को खिलाती है
            जाड़े हो या गर्मी खुले बदन सहती है
            बरसात से भी नहीं कभी घबराती है
            दुनिया में चलती खूब तेरी मनमानी
चिड़िया रानी चिड़िया रानी
मुझे तू लगती बड़ी सुहानी





नयन से नयन

नयन से नयन मिली तो क्या बात हुई,
दिल पे उसने दस्तक दी तो क्या बात हुई.
लफ़्जों के मोहताज़ कहां हुआ करते हैं हम,
इशारों में ही दिल की बात बता दी तो क्या बात हुई. 

Monday, 18 May 2015

शिकवे शिकायत का झूठा इल्जाम,

शिकवे शिकायत का झूठा इल्जाम,
यू ओरो को मैं न कभी देता हूँ।
वक्त की नजाकत को देख बस,
खुद को ही बदल लेता हूँ।

जो आँखों से उतर के

जो आँखों से उतर के, दिल मे आए, मीत बन जाए,,
जिगर की टीस जब, होठों पे आए, गीत बन जाए,,
मुझे ना रोक पाओगे, कभी तुम गीत लिखने से,,
तुम्हारी याद मे जो भी लिखूं वो, गीत बन जाए,, !!

Friday, 15 May 2015

शब्दों को चुन चुनकर

शब्दों को चुन चुनकर यू ही मैंने उसके हुस्न ए जलवे पर
एक मधुमय सा गीत लिख डाला।
तारीफ की मधुर चाहत लिए बैठा था दिलपर,
पर झूठा शायर कहके उसने मुझे बदनाम कर डाला।

Tuesday, 12 May 2015

चेहरे की नूर



"चेहरे की नूर कभी बूझा के मत रखना,
अरमां दिल की दिल पे दबा के मत रखना.
अगर चाहते हो आसमां की बुलंदियों को छुना,

तो भीड़ में खुद को कभी छिपा के मत रखना."  


Saturday, 9 May 2015

एक अजनवी


एक अजनवी वीरान इस शहर में 
पल दो पल जी लेने का बहाना ढूँढता है, तन्हाइयों का आलम छंट जाए दिल से जरा, इसलिए हर सूरत में दोस्ती का खजाना ढूंढता है. 

यादों के झरोखों से झांककर देखा गांवों की गलियों में गुज़री अतीत की रेखा, बहुमंजिली इमारत के बंद कमरे में बैठा आज भी वही पूराना घर का अंगना ढूंढता है. एक अजनवी वीरान इस शहर में पल दो पल जी लेने का बहाना ढूँढता है, 

वक्त की नज़ाकत को परख इस कदर बड़े हुए किसी ने गले लगाया कोई था झुकाने को अड़े हुए, भुला गिले शिकवे अब शब्दों का एक प्यारा संसार रचें, इसलिए कमरे के सूनेपन में भी कोई अफ़साना ढूंढता है. एक अजनवी वीरान इस शहर में पल दो पल जी लेने का बहाना ढूँढता है, 

kavita@Govind