Tuesday, 25 August 2015

लखिया

लखिया रामनारायण पाठक की पुत्री थी. रामनारायण पाठक पेशेवर शिक्षक थे, पर लक्ष्मी की उसपर विशेष कृपा नहीं थी. परिवार के भरण-पोषण के बाद वे बमुश्किल ही कुछ जोड़ पाते थे. उसकी आमदनी तो वैसे दस हजार मासिक थी, लेकिन खर्च भी कम कहां था ? हाथ छोटा कर वह जो भी जोड़ता पत्नी की दवा-दारू में सब हवन हो जाता था. उसका परिवार बहुत बड़ा नहीं था. वे लोग गिने-चुने चार सदस्य थे – दो लड़कियां और अपने दो. बड़ी लड़की लखिया आठ वर्ष की थी और छोटी मित्रा पांच की. उसकी पत्नी भगवती खूब धरम-करम करती किंतु, अपने पेट की पीड़ा से वह पिछा नहीं छुड़ा पाती थी. पाठक जी ने उसके पेट की पीड़ा के लिए क्या नहीं किया, कई शहरों के नामी-गरामी डॉक्टरों से इलाज करवाए, लेकिन आजकल की बीमारियों पर तो आग लगे छुटने के नाम ही नहीं लेती ?
एक दिन अचानक रामनारायण पाठक दुनिया दारी से मुक्त होकर चिरस्थायी निद्रा में लीन हो गए. भगवती की दशा अब आगे नाथ न पिछे पगहा वाली हो गई थी. घर के मुखिया का इस तरह अचानक चल बसना अच्छे -अच्छों को भी तोड़ कर रख देता है और भगवती तो ठहरी सदा पेट की बीमारी से परेशान रहने वाली एक मरीज. अब उसे जीने की कोई इच्छा नहीं थी किंतु, अपनी बेटियों के लिए उसे जीना जरूरी था. वह जिन्दगी से भाग नहीं सकती थी. जीवन में सुरसा की तरह मुंह फैलाए खड़ी चुनौतियों से उसे जुझना ही था. उनसे आर-पार की लड़ाई लड़नी ही थी. उसे कृष्ण बनकर जीवन के इस रणभूमि में अपनी बेटियों का मार्गदर्शन करना था. आगे की चुनौतियों ने अपने पति के विषाद में डुबी भगवती को झकझोरकर उठा दिया था. उसे जल्द ही संभलने पर मजबूर कर दिया था. उसने भी मरते दम तक चुनौतियों से लड़ने का प्रण ले लिया था. आस-पास के छोटे-छोटे बच्चों को ट्यूशन पढ़ाकर वह अपने जीवन की गाड़ी तिल-तिल आगे बढ़ाने लगी थी. अपनी दोनों बेटियों की परवरिश में उसने खुद को पूरी तरह समर्पित कर दिया था. कौन जाने किसका भाग्य में क्या लिखा है ?
लखिया बड़ी रूपसी थी और स्वभाव से उतनी ही चुलबुली भी. उसके अंग-अंग मानो सांचे में गढ़े गए हो. यौवन की दहलीज पर पांव रखते ही उसके रूप ने अद्भुत निखार ले लिया था. यौवन की मादकता आंखों में तिरछी चितवन बनकर, अधरों पर मधुर मुस्कान बनकर और बदन में आलस्य बनकर प्रकट होने लगी थी. उसने विश्व को मोह लेने वाला जगमोहिनी रूप पाई थी. गांव भर में वह सुन्दरता की मिसाल थी. वहां के लोगों को अपनी इस बिटिया पर फ़ख्र था.     
मिडिल पास कर अब वह हाई स्कूल में दाखिल हो गई थी. उसके मन में तरह-तरह के सपने पलने लगे थे. उसकी महत्वाकांक्षाएं लताओं की भांति डगडगाती हुई शिखर की ओर बढ़ने लगी थी. बचपन से ही उसपर जिन्दगी के कड़वे सच का दंश पड़ने लगा था. मुश्किलें इंसान को मजबूत बनाती है. पिता की मृत्यु के बाद लखिया को सिर्फ और सिर्फ परेशानियां ही नसीब हुई थी, जिसने कम उम्र में ही उसे काफी परिपक्व कर दिया था. वह खूब पढ़ना चाहती और आगे बढकर समाज के लिए कुछ करना चाहती थी, किंतु कभी-कभी घर की माली हालात उसे दुष्चिंता में डाल देती थी. उसका मन उदास हो जाता. सारे जोश, जुनून ठंडे पड़ जाते. किंतु, भगवती उसे सदा प्रोत्साहित करती रहती थी.
लखिया अब सयान हो गई थी. वह कॉलेज में दाखिला ले चुकी थी. उसका स्वभाव भी काफी बदल गया था. अब वह शर्मिली, संकोची और गंभीर स्वभाव की हो गई थी. सबसे नज़रे बचाती हुई वह कॉलेज आना-जाना करती थी. लोगों की कुदृष्टि का उसके मन में भय बना रहता था. वह एकदम पग-पग सचेत रहती थी. आए दिन देश-दुनिया में हो रही घटनाओं से भगवती का कलेजा कांप उठता था. बेटी को वह हमेशा सावधान करती रहती थी. दुनिया में कुछ लोग बड़े निर्मोही होते हैं. दूसरों की खुशी उनकी आंखों की किरकिरी बन जाती हैं. दूसरों के सुख-चैन लूटने में उन्हें वैसे ही आनन्द मिलता जैसे कसाई को निरीह पशुओं के कत्ल करने में मिलता है. खासकर लखिया जैसी खूबसूरत कलियों पर तो उनकी गिद्ध दृष्टि बनी रहती है. उनके रसीले जीभ लपलपाने लगते है. उनकी आंखों में हैवानियत का खून चढ़ आता है. वे अपना होशोहवास गंवा बैठते हैं और खिलने से पहले ही उस कली को अपने दरिंदे हाथों से मसल कर नष्ट कर देते हैं.
लखिया खूबसूरत थी. नवयुवकों का उसके प्रति आकर्षित होना तो स्वभाविक था. कॉलेज में कई लड़के उसके आगे पिछे मंडराते रहते थे. किंतु, उनकी नियत बुरी नहीं थी. उम्र का तकाजा था कि वे बस ऐसा स्वभाविक रूप से ही कर रहे थे. लखिया से उनकी नजरें टकरा गई या किसी बहाने उससे दो टूक बातें हो गई तो वे खुश हो जाते थे. गर्व से खुद की पीठ थपथपा लेते थे. लखिया को उन लड़कों से कोई भय नहीं था. उसे भय तो सिर्फ ललन से था. ललन बड़े बाप का बिगड़ेल औलाद था. दिन-रात वह अपनी ऐयासी में लगा रहता था. दुनिया की कोई ऐसी बुरी आदत शेष नहीं बची थी, जिसे उसने नहीं अपनाई हो. ड्रग से लेकर जुआ तक कुछ भी उससे अछूता नहीं था. उसका बाप धुरंधर सिंह भी कुछ वैसा ही दबंग किस्म का आदमी था. वह उस इलाके में कोयला माफिया का डॉन था. वहां की पुलिस भी उसके द्वार पर हाजिरी देने जाता था. उसकी करतूतों से जन-जन परिचित था किंतु, किसी के पास उसके विरूद्ध मुंह खोलने की ताकत नहीं थी. उसके विरूद्ध जाने वालों को वे सीधे उठवा देते थे.
ललन उसी कॉलेज में पढ़ता, जहां लखिया पढ़ती थी. बाप का ही पानी बेटा ने भी लिया था. अभी से ही बाप की तरह उसने भी दबंगाई शुरु कर दी थी. कॉलेज आना-जाना तो वैसे वह कम ही करता था. उसका ज्यादा समय तो घर और कॉलेज से बाहर ऐयासी करने में ही बितता था. किंतु, वह जब भी कॉलेज आता वहां हड़कंप मच जाता था. वहां की लड़कियां इधर-उधर छिपती फिरती और भय से कोई भी उसके सम्मुख नहीं आती थी. किसी लड़की पर अगर उसकी बुरी नजर पड़ गई तो फिर उसकी खैर नहीं. उसकी इज्जत-आबरू बच नहीं पाती थी. कॉलेज की कई लड़कियां उसके हवश का शिकार हो चुकी थी. उसके खिलाफ पुलिस, थाने सब कुछ हुआ था लेकिन, ढाक के वही तीन पात. आजतक उसे कोई सजा नहीं दिलवा पाया था. उसकी बुरी नजरों से बच कर रहने में ही सबको बुद्धिमानी लगती थी.
एक दिन अचानक लखिया का ललन से सामना हो गया था. वह कॉलेज से बाहर निकल ही रही थी कि अचानक कॉलेज के प्रवेश द्वार पर उसे अपने दोस्तों के साथ आता हुआ ललन मिल गया. वह डरी सहमी सिर झुकाए, किताबों को सिने से लगाए आहिस्ता-आहिस्ता आगे निकल गई थी. शुक्र था कि उसने लखिया को सिर्फ घुरकर देखा ही था. उसने ना किसी तरह की रोक-टोक की और ना ही उसके साथ कोई बदतमिजी की. वर्ना उसकी आदत इतनी अच्छी कहां थी ! वह तो लड़कियों को सीधे छेड़ना शुरू कर देता था. बदतमिजी पर उतर आता था.
लखिया सुन्दर थी इसीलिए वह ललन को पहली नज़र में ही भा गई थी. उसके दिल के किसी कोने में उसने कम्पन्न पैदा कर दिया था. धीरे-धीरे वह लखिया का आशिक़ बन गया. ये प्यार-व्यार भी क्या चीज है आज तक किसी को समझ नहीं आया है. इसकी ना कोई परिभाषा है, ना रूप, ना रंग, ना गंध. ढाई अक्षर के इस शब्द में ही सारा जादू समाया हुआ है, जिसने ना जाने कितने को मजनू, रांझा और फरहाद बना डाला है. आज उसी जादू के भंवर में एक और हलाल हो गया था. ललन का वैसे ही ज्यादातर समय सुन्दर-सुन्दर लड़कियों की बाहों में ही गुजरता था किंतु, उनमें से किसी से उसे प्यार नहीं हुआ. उसके दिल की गाड़ी गांव की भोली-भाली निर्दोष बाला लखिया पर जा अटकी थी. दोनों के बीच कितनी असमानताएं थी. ललन जहां बुराइयों के कीचड़ से लथपथ था, वहीं लखिया मानसरोवर में खिले कमल की ताजी पंखुड़ियों सी निर्मल. ललन निष्ठुर पाषाण दिल था तो लखिया शरदकाल के अलसाई सुबह में दूब के ऊपर पड़ी ओस की बूंद की तरह कोमल.
“साले जो भी हो किंतु, लखिया है बड़ी सुन्दर” – एकदिन ललन ने बातचीत के दौरान अपने दोस्तों से कहा.
कौन लखिया ? – उसके दोस्तों ने हैरानी से पूछा.
वही नई लड़की, डरी सहमी-सी नज़रे झुकाए चलने वाली. – ललन ने शब्दों के अनुरूप अपना सर हिलाते हुए कहा.
उसके दोस्तों को बड़ा आश्चर्य हुआ. आजतक उसने किसी भी लड़की को उसका नाम लेकर संबोधित नहीं किया था. उसके जुबान पर लड़कियों के लिए बस ‘लौंडिया’ शब्द ही आता था. लड़कियों के प्रति ना उसका कोई सम्मान था और ना ही इज्जत. उन्हें केवल वह उपभोग की वस्तु मानता था. किंतु, आज अचानक लखिया के लिए उसके मन में सम्मान देखकर उनके दोस्तों को हैरानी हुई.
क्यों आपको उसका नाम कैसे पता ? – एक दोस्त ने पूछा.
ललन मुस्कराते हुए बोला – मैंने उसकी बायोग्राफी पता कर ली है. वह बिसनपुर के स्वर्गवासी शिक्षक रामनारायण पाठक की बेटी है. ईमानदारी के क्षेत्र में उसके पिताजी का काफी नाम था. पापा बता रहे थे कि एक बार उसके साथ पापा का भी पंगा हो गया था. वह पापा को अंदर करवाने की धमकियां भी दे गया था किंतु, किस्मत से वह खुद ही ऊपर चला गया था, वर्ना पापा को ही अपना हाथ गंदा करना पड़ता.
तो तू उसपर इतना हमदर्दी क्यों जता रहा है ? – दूसरे दोस्त ने पूछा.
एक्चुअली वह मुझे बहुत प्यारी लगती है. उसे देखते ही मेरे दिल में कुछ-कुछ होने लगता है. – ललन ने कहा.
तब बताओ. कब तुम्हारी सेवा में उसे हाजिर करूं ? – तीसरे दोस्त ने कहा.
नहीं....नहीं उसके साथ मैं ऐसा नहीं कर सकता. उसे दुख होगा. मैं तो उसे दिल की रानी बनाना चाहता हूं. उसका सच्चा प्यार पाना चाहता हूं. उसके मन को जीतना चाहता हूं. तुमलोग उसके साथ कोई बदतमीजी मत करना – ललन ने सभी को चेताया.
कॉलेज में कई बार लखिया का सामना ललन से हुआ किंतु, उसके साथ किसी प्रकार का कोई बदतमीजी नहीं हुई. धीरे-धीरे लखिया के मन में ललन से जो डर था वह जाता रहा. ललन के स्वभाव में भी काफी बदलाव आ गया था. उसने भी अपनी बुरी हरकतें कम कर दी थी. कम से कम कॉलेज में तो उसने शराफत दिखानी शुरू कर दी थी. अब ना किसी लड़की को वह छेड़ता और ना ही किसी के साथ कोई बदतमीजी करता. उसने अपनी पाश्विकता त्याग दी थी और इनसान के दल में शामिल होने के लिए वह पंक्ति में खड़ा हो चुका था.
एक दिन उसने कॉलेज केम्पस के बाहर रास्ते में लखिया को रोक कर कहा – लखिया ! मैं तुम्हें चाहने लगा हूं और तुमसे शादी करना चाहता हूं.
लखिया ने कुछ जवाब नहीं दिया और वह आगे बढ़ गई. लड़कियों की चुप्पी में ही हां छिपा होता है इसी मानसिकता में आधी दुनिया जीती है. इसी मानसिकता की वजह से ना जाने कितने आशिकों के दिल का आशियाना उजड़ा है. कितने देवदास बनकर दर-दर भटकता रहा है. कितनों ने अपना सुख-चैन गंवाया है और ना जाने कितनों ने अपनी जान गंवाई या फिर निर्दोष लड़कियों पर आफ़त ढ़ाही है.
ललन भी आज उसी मानसिकता का शिकार हुआ था और उसने मन ही मन मान लिया था कि लखिया को उसका प्रस्ताव मंजूर है लेकिन, वह शर्म से बोल नहीं पा रही है. अपने दोस्तों में भी उसने यह बात फैला दी. शीघ्र ही यह बात पूरे कॉलेज में वाइरस की तरह फैल गई. लखिया से कई सवाल होने लगे, जिसका कोई जवाब उसके पास नहीं था. कुछ लड़कियों ने तो उसपर ताना कसना भी शुरू कर दिया था. सबकी नज़रों में वह गिरने लगी थी. कॉलेज के इस माहौल में उसका दम घुटने लगा था. कॉलेज में उसके बारे में हो रही तरह-तरह की बातें अब उसके बर्दास्त से बाहर हो गई थी. एक दिन तंग आकर उसने ललन से ही दो हाथ कर लेने का फैसला कर लिया.
तुम्हारी हिम्म्त कैसी हुई मेरे बारे में ऐसी अफ़वाह फैलाने की ? किसने कहा कि मैं तुमसे शादी करने के लिए तैयार हूं ? मेरी किस्मत फ़ूटी नहीं है, जो मैं तुमसे शादी करूंगी. तुम्हारे जैसे गुंडा से शादी करने से भला है कि मैं गंगा में कूद कर अपनी जान दे दूं. – सबके सामने उसने ललन को एक दिन झाड़ लगा दी.
उस दिन के बाद वह कॉलेज में बहुत कम ही दिखी. कॉलेज से एक तरह से उसका मन घबरा गया था. कॉलेज की सारी बातें उसने अपनी मां को बता दी. मां का दिल घबरा गया. उस दबंग के विरुद्ध जाने का मतलब खुद के ही पांव में कुल्हाड़ी मारना था. उसकी मां ने भलाई इसी में समझी कि कहीं कुछ ऊंच-नीच हो जाए इससे पहले बेटी की शादी कहीं कर दी जाए.
आज भगवती के घर खूब चहल पहल थी. आपुस कुटुम्ब लगन-हांडी के साथ एक-एक कर उसके घर आ रहे थे. आस-पास की स्त्रियां अतिथियों की द्वार छेकाई कर उनका आव-भगत करने में व्यस्त थी. सबके मुखमंडल पर आनन्द और खुशी के भाव नाच रहे थे. भगवती मशीन-सी दौड़ती फिरती सबको अलग-अलग कामों की जिम्मेदारियां सौंप रही थी. घर की सजावट का काम भी पूरा हो चुका था. खर्च के हिसाब-किताब की जिम्मेदारी भगवती का भाई दीनानाथ संभाल रहा था. लखिया की शादी में बस दो दिन शेष रह गए थे. मन में वह शादी को लेकर उत्साहित थी किंतु, अंदर से भयभीत भी. ज्यों-ज्यों शादी का समय निकट आ रहा था उसके दिल की धड़कन बढ़ती जा रही थी. आस-पास की हमउम्र लड़कियां उसके घर आकर वहां के वातावरण को गीतमय कर रही थी.
वह दिन भी आ गया, जिसका सभी को बेशब्री से इंतजार था. आज लखिया के लिए दूर शहर से कोई डोली सजाकर उसे लेने आ रहा था. लखिया भी दुल्हन के रूप में पूरी तरह सज संवर कर तैयार थी. लखिया तो सुन्दर थी ही किंतु, दुल्हन के रूप में तो वह अद्भुत लग रही थी मानो स्वर्ग से कोई परी उतर आई हो. वहां का पूरा माहौल आनन्दमय था. भगवती बाहर से प्रसन्न होने का दिखावा कर रही थी किंतु, अंदर ही अंदर वह कलप रही थी. उसने अपना खून से सींचकर जिगर के जिस टुकड़े को बड़ा किया था, आज वह उससे दूर जा रही थी. लाख कोशिश करने के बावजूद भी वह खुद को संभाल नहीं पा रही थी. लखिया ने उसे नहीं रोने की सौगंध दे रखी थी किंतु, मां की ममता को भला कोई बांध क्या रोक पाए. एकांत पाते ही वह छुप-छुप कर रो लेती लेकिन, सामने वाले को अपना दर्द का अहसास नहीं होने देती. अपना मन को उसने काफी समझाया और दिल मजबूत किया. बेटी पराया धन है एक ना एक दिन तो उसे डोली में बिठाकर खुद से दूर करना ही पड़ता. जिसपर अपना कोई वश नहीं चले तो भला अपना दिल को नाहक छोटा क्यों किया जाए ?
रात 8 बजे पूरे गाजे-बाजे के साथ वहां बारात आ गई थी. बाहर नाच-गान की धूम चल रही थी और अंदर वरमाला की रस्म के लिए लखिया के मेक-अप को अंतिम रूप दिया जा रहा था. पटाखों की धूम-धड़ाके के साथ मस्ती का माहौल बना हुआ था. सभी अपनी-अपनी धुन में मस्त थे. बारातियों का दल बेंड-बाजे के ताल पर थिरक रहा था. बारातियों की उसी भीड़ में ललन अपने दोस्तों के साथ वहां आ पहुंचा था. वह शराब के नशे में चूर था. डगमगाते कदमों के साथ वह स्टेज तक पहुंचने का प्रयास कर रहा था. वह लखिया को अपना बनाना चाहता था किंतु, अब लखिया उसके हाथ से निकल रही थी. इसीलिए उसकी आंखों में खून सवार हो गया था.  उसने ठान लिया था कि अगर लखिया उसकी नहीं हुई तो वह उसे किसी और की भी नहीं होने देगा.
चारों ओर लोग बैंड बाजे की धुन में नाच रहे थे. दुल्हा स्टेज पर बैठा था. बारातियों में दुल्हन की झलक पाने की उत्सुकता बनी हुई थी. उसी समय दुल्हन को उनकी सहेलियां वरमाला के लिए स्टेज पर धीरे-धीरे ला रही थी. दुल्हन को देखते ही बारातियों ने उसका जोरदार स्वागत किया. तालियों और सिटियों से आसमान गुंज उठा. दुल्हन के पांव होले-होले स्टेज की ओर बढ़ रहे थे. उसकी सहेलियां उसे घेरी हुई थीं. दुल्हन के हाथ में आरती की थाली सजी हुई थी और वह मंद-मंद मुस्करा रही थी.
उधर ललन ताक लगा रहा था. धीरे-धीरे उसने अपने पॉकिट से रिवाल्वर निकाल लिया था. वह जल्दी-जल्दी स्टेज के करीब पहुंचने का प्रयास करने लगा. वहां भीड़ भी खचाखच थी. वह सभी को धक्का देते हुए आगे बढ़ता गया. वह अब स्टेज के काफी करीब पहुंच चुका था, जहां से वह लखिया को पूरी तरह देख सके. उसने रिवॉल्वर को लोड किया और हाथ धीरे-धीरे थोड़ा ऊपर उठाया. भीड़ से नजरें बचाकर उसने लखिया के सीध अपना हाथ ले गया और उसके सिने पर सीधा निशाना साधा.
वहां मस्ती भरा माहौल था. महिलाएं अपने मधुर स्वर में नेग गीत गा रही थी. सबके मुखमंडल पर आनन्द ही आनन्द छाया हुआ था. दुल्हन के रूप-लावण्य को देखकर वहां हर कोई मंत्र-मुग्ध था लेकिन, ललन और उनके दोस्तों के दिल की धड़कन तेज़ हो हई थी. दुल्हन के रूप में लखिया के रूप-सौन्दर्य देखकर ललन के दोस्तों का भी दिल पसीजने लगा था किंतु, अब वे कुछ नहीं कर सकते थे. वे लोग ललन से बहुत दूर खड़े थे और उस भीड़ में ललन तक पहुंचना उनके लिए असम्भव था. ललन की अंगुली रिवॉल्वर के ट्रीगर को स्पर्श करती हुई उसपर अपनी पोजिशन ले चुकी थी. उसकी आंखों में खून सवार था. ट्रीगर दबाने से पहले वह एक बार लखिया को जी भर कर देख लेना चाहता था. लखिया आनन्दमग्न थी. उसके चेहरे पर अद्भुत-सी चमक आ गई थी. जिस लखिया को उसने अपने सामने हमेशा डर से सहमी हुई देखी थी, उसे आज पूर्ण निडर और आत्मविश्वास से लबरेज देखकर वह खुद आश्चर्य चकित था. लखिया ने दुल्हे के ललाट पर तिलक लगाकर उसकी आरती उतारी. उसकी सहेलियों ने दुल्हा और दुल्हन दोनों के हाथों में वरमाला दे दी. वरमाला पहनाने के लिए लखिया ने ज्योंही अपना हाथ ऊपर किया ठांय...ठांय...ठांय की जोरदार ध्वनि के साथ तीन गोलियां चल गई. भींड़ में एकदम-सी भगदड़ मच गई थी. किसी की समझ में कुछ नहीं आ रहा था, बस सब अपनी जान बचाने के लिए बेतहासा इधर-उधर भागे जा रहे थे.
गोलियां चलने की आवाज़ सुनते ही ललन के दोस्त वहां से पलायन हो गए थे और ललन लखिया के पैरों पर गिरकर माफी मांग रहा था. उसकी आंखों में अब खून नहीं बल्कि, पश्चाताप के आंसू थे. उसका नशा उतर गया था और अब वह पूरे होशोहवास में था. अपने दाएं हाथ में वह रिवॉल्वर थामे हुए था, किंतु उसमें अब गोलियां नहीं थीं. सारी गोलियां उसने हवा में दाग दी थी. लोग अब स्टेज पर जमा होने लगे थे.
अपने घुटनों के बल खड़ा होकर उसने लखिया से कहा - लखिया मुझे माफ कर दो. मैं तुम्हें जान से मारने आया था, क्योंकि तुमने मेरी बात नहीं मानी थी. मुझे छोड़कर तुम किसी और से शादी करने जा रही थी. मुझे इसकी खबर मिलते ही मैं आपे से बाहर हो गया था और अपने दोस्तों के साथ तुम्हें जान से मारने आया था लेकिन, मैं चाहकर भी तुम पर गोली नहीं चला सका और सारी गोलियां हवा में दाग दी, क्योंकि मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूं. तुमने मेरी आंखें खोल दी है. मैं सचमुच बहुत बुरा हूं. सभी लड़कियां मुझसे डरती हैं इसीलिए कोई मुझसे प्यार नहीं करती. अबतक मैंने सिर्फ़ दूसरों को मजबूर किया था किंतु, आज तुमने मुझे मजबूर कर दिया है. मेरे पास ऐशोआराम की सारी चीजें है फिर भी मैं तुम्हारा प्यार नहीं पा सका, क्योंकि मेरे पास इनसानियत की कमी है. आज मैं तुमसे वादा करता हूं कि अब मैं एक आम इनसान की तरह जिन्दगी जीऊंगा. तुम मेरी नसीब में ही नहीं थी इसीलिए रब से दुआ है कि तुम जहां रहो खुशहाल रहो.     
तब तक वहां पुलिस आ चुकी थी. थानेदार साहब ने उसे धकियाते हुए उठाया और उसका कॉलर पकड़ते हुए एकदम कड़क आवाज़ में कहा - साले ! गुंडा गर्दी करते हो ? भीड़ में गोलियां चलाते हो ? चलो आज तुम्हें थाने में बदलाता हूं. ऐसी धारा तुमपर ठोकूंगा कि जिन्दगी भर जेल में ही सड़ोगे.
हां थानेदार साहब ! इस दरिंदे को कड़ी से कड़ी सजा दीजिए. इसने मेरी बेटी का जीना मुश्किल कर दिया था और आज इसे जान से मारने पहुंच गया है, इसे छोड़िएगा मत. – लखिया की मां ने ललन को कोसते हुए कहा.
नहीं थानेदार साहब ! इसका कोई कसूर नहीं है. यह मेरा अच्छा दोस्त है. हम एक साथ कॉलेज में पढ़ते है और आज मेरी शादी में यह मेरे निमंत्रण पर ही आया था. इसने अपनी खुशी जाहिर करने के लिए आसमान में गोलियां चलाई थी किसी को डराने या हानि पहुंचाने के लिए नहीं. अगर इसे गोलियां चलाने की अनुमति नहीं है तो आप इसपर कानूनी कार्रवाई कर सकते हैं, अन्यथा इसे प्लीज छोड़ दीजिए. – लखिया ने थानेदार साहब से अनुरोध किया.  
ठीक है मैडम ! हम ऐसा ही करेंगे. फिलहाल इसने गोलियां चलाई है इसीलिए थाने ले जाना जरूरी है. – थानेदार ने कहा.
जैसा आप उचित समझे, प्लीज. – लखिया ने कहा.
थानेदार साहब ने अपनी जिप्सी में उसे बैठाकर थाने ले गया.  
लखिया की मां अपनी बेटी को आश्चर्य से देख रही थी कि आखिर उसने ऐसा क्यों किया ? उसे दण्ड दिलाने के बजाय उसका बचाव क्यों किया ?
लखिया समझदार थी. उसे पता था कि उसपर कड़े आरोप लगाकर भी उसे सजा नहीं दिलाई जा सकती थी. थानेदार नए थे. उसे ललन और उसके बाप के बारे में पता नहीं था इसीलिए वह हेंकड़ी दिखा रहा था, वर्ना उसे थाने तक ले जाने की भी हिम्मत उसमें कहां होती ? ललन का हृदय परिवर्तन हो गया था इसीलिए उसे सजा दिलवाकर उसके अंदर छिपे जानवर को वह फिर से नहीं जगाना चहती थी. शादी की प्रक्रिया फिर से आरम्भ हो गई. लोग फिर एक बार झूम उठे.

    

पाखण्डी समाज

पाखण्डी समाज
सांझ का समय था. किसनलाल अपने बेलों को चारा खिलाने में मग्न था. मंद-मंद पूरबा चल रही थी. कुछ पल के लिए वह ठिठक गया और कमर सीधी करते हुए नथुना फूलाकर इधर-उधर सर घुमाते हुए कुछ पयान करने लगा. जोर-जोर से वह सांसें भर रहा था, सीआईडी कुत्ते की तरह जैसे किसी चीज का सुराग खोज रहे हो. हाँ, वह सुराग ही खोज रहा था. बासमती चावल की खीर की सुगंध का सुराग. खीर की सुगंध आ कहां से रही थी इसका अंदाजा लगाने का वह भरसक प्रयास कर रहा था. बासमती चावल की खीर का वह बड़ा रसिक था. कान के साथ-साथ उसकी नाक भी खूब तेज़ थी. सही पयान आखिरकार उसने कर ही लिया. यह खुशबू उसके घर की रसोई से ही आ रही थी. वह बड़ा गदगद हुआ. उससे रहा नहीं गया. ज़ोर से हाँक लगाई – “बबुआ की माई ! का बन रहा है आज ?”
बबुआ की मां रसोई घर से ही बोली – “सोची, बहुत दिनों से कुछ भल-मंद नहीं हुआ है इसीलिए आज बसमतिया खीर बना दे रही हूं. खीर खाए भी बहुत दिन गुज़र गए हैं.”
“आज लगता है सूरज पच्छिम से उगा था का जो तुम्हें बसमतिया खीर की याद आई ?” - किसनलाल ने कुछ छेड़ने के अंदाज में व्यंग्य तीर चलाया.
“हूंह ! पेटमधवा कहीं के. कितनों खिलाओ सबूर नहीं.” - बबुआ की मां तुनक कर मुंह टेढ़ा करते हुए बोली. 
“काहे बबुआ की मां, एतना जल्दी रुठ काहे जाती हैं ? हम तो यूं ही मजाक कर रहे थे. पर, आप तो सीधे दिल पे लगा लेती हैं.”
“अब हमारी मजाक करने की उमर रही का ? आप तो जितना बेसार हो रहे हैं उतना ही ज्यादा रसिक होते जा रहे हैं. जरा उमर का भी लिहाज कीजिए.”  
दोनों के बीच बातचीत का सिलसिला जारी था. अंधेरा अपने आगोश में सबकुछ समेटता जा रहा था. झींगुरों का स्वर तीव्र हो गया. मौसम अपना रूख बदल रहा था. आसमान में इग्गी-दुग्गी बादलों के टुकड़े भटकते हुए चले आए थे. दो चार तारे भी टिमटिमाने के लिए उतावले हो रहे थे. गांव के बच्चे भी खेलकूद कर वापस अपने- अपने घरों में जा रहे थे. शोरगूल कम हो गया. शांति का डेरा पड़ने लगा था. किसनलाल अपने बैलों को खिला पिलाकर गोहाल में बांध आए.
रसोई से बबुआ की मां बोली – “सुने ! बिहान बबुआ का फोन आया था. बोल रहा था अपने साथियों के संग बंबई जाएगा. मैंने साफ मना कर दिया. कह दिया घर आकर हमलोगों से एक बार मिल लेवे. अब कितना पढ़ेगा लिखेगा ? ईए बीए पास हो गया. अब सयान भी तो हो गया है. बियाह शादी कर अब अपना घर गिरस्ती संभाले. साल भर की खोराक तो अपनी खेती से आ ही जाती है. ठीक कहती हूं ना ? आप क्या कहते हो ?”
“हां....हां.....काहे नहीं. अब हमलोगों का भी तो हाड़-मांस कमज़ोर होने लगा है. वही तो हमारे लिए एक सहारा है. घर आते ही हम उसे समझा देंगे. अब बंबई-उंबई कहीं ना जाएगा. एक बढ़िया खानदानी लड़की देख उसका बियाह करा देंगे.” – पत्नी की बातों में रजामंदी जताते हुए किसनलाल ने अपना निर्णय सुना दिया.
किसनलाल एक साधारण किसान था. आठ दस बीघे का मालिक, एक छोटा-सा पोखरा था, पर था सदानीर. घर-वार भी कमज़ोर नहीं था. लकडी का बना मजबूत दो चरचल्ला मकान था. दो हर धुर था और दो दुधारु गायें जिनकी सेवा में वह रात दिन लगा रहता था. अगर आज के संदर्भ में देखा जाए तो उन पशुओं से किसनलाल को जितना लाभ होता था उससे कहीं ज्यादा उसे हानि उठानी पड़ती थी. बैलों से तो बस खेती के समय ही काम लिया जाता था और सालभर बैठे बिठाए खिलाना पिलाना पड़ता था. साथ ही, बच्चों की तरह देखरेख भी करना पड़ता था. गाय से सालभर में जितना दूध मिलता उससे कहीं ज्यादा उसके चारे में खर्च हो जाता था. फिर एक साल तो मुफ़्त में बैठे बिठाए खिलाना पड़ता था. ऐसा इकोनॉमिकल कैल्कुलेशन उसने कभी किया ही नहीं था या फिर वह करना ही नहीं चाहता था. निःस्वार्थ भाव से पूरे आनंद के साथ वह गोसेवा में लगा रहता था. लेकिन, अब दौर कितना बदल गया है. गांव में लोग पढ़े-लिखे बहुत कम होते हैं फिर भी, उनका दिल बहुत बड़ा होता है. शहरों में लोग पढ़-लिख ज्यादा गए हैं, पर उनका दिल छोटा होता गया है. और आज का आलम तो ये है कि लोग अपने माता-पिता की सेवा-सुश्रुषा में भी इकोनॉमिकल कैलकुलेशन करने लगे हैं. वाह ! डेवलॉपमेंट की कैसी पश्चिमी बयार चली, जिसने नैतिकता की मूल को ही झकझोर डाली. पशुओं की सेवा तो दूर की बात लोग अपने माता-पिता की सेवा से भी कतराने लगे हैं.     
बबुआ किसनलाल की एकमात्र संतान था, जो शहर में रहकर पढ़ाई कर रहा था. किसनलाल की पत्नी रत्नावली ज्यादा पढ़ी-लिखी नहीं थी पर, थी सांसारिक सुझबूझ की मालकिन. जिन मामलों में किसनलाल भी पछाड खा जाता वह उसे बड़ी चतुराई से सलटा देती थी. उसी की इच्छा से बबुआ को पढ़ने लिखने शहर भेजा गया था. उस गांव में लोग पढ़े-लिखे कम ही थे, पर थे बड़े धूर्त किस्म के. कोई सुख-चैन से जीए तो बाकि उसे पचा नहीं पाते थे. उसके खिलाफ तिकड़मबाजी होने लगती. सुख चैन छिनने की चालबाजी शुरु हो जाती थी. किसनलाल की पत्नी बड़ी अग्रसोची थी. भावी आगत-विगत सब वह भांप गई थी इसीलिए बबुआ को होशियार बनने शहर भेज दिया था.     
बबुआ पूरे दस साल बाद गांव लौट रहा था. गांव की धरती पर पांव रखते ही उसका रोम-रोम गदगद होने लगा. चारों ओर हरियाली थी. शहर की भागमभाग भरी जिन्दगी से दूर गांव के शांतिमय वातावतण उसे बहुत लुभावना लग रहा था. वहीं गांव की बिनबदली दशा देखकर उसे बड़ा आश्चर्य हुआ. वही पूरानी सड़क, तालाब, खेत-खलिहान, लोगों की चाल-ढ़ाल व रहन-सहन सबकुछ वैसे ही था जैसे दस साल पहले था. वहां इग्गी-दुग्गी नई झोपड़िया सिर्फ़ बनी थी.
किंतु, समय के साथ वहां की कल्चर में एक अनौखा बदलाव जरूर आ गया था. दस साल पहले उस गांव में एक विशाल इमली का पेड़ था. उस पेड़ की छांव में गांव के रसिक लोग दिन की धूप भरी दोपहरी में झूमर लगाया करते थे और मांदर के ताल पर थिरक-थिरक कर अपना मनोरंजन किया करते थे. वह पेड़ वहां आज भी था किंतु, अब ना झूमर के रसिक लोग उस गांव में रहे और ना ही उनकी झूमर मंडली. मांदर की धुन तो मानो उनके साथ ही स्वर्ग सिधार गयी. अब उन झूमर के रसिक लोगों की जगह गांव के अनपढुवे छोकरों ने ले ली थी. ऑल्ड जेनेरेशन झूमर के रसिक हुआ करते थे और ये न्यू जेनेरेशन जुआ के रसिक हो गए थे. वे लोग सबका मनोरंजन किया करते थे और ये लोग सबका जीना हराम कर रहे थे. पहले उनके मांदर की कर्णप्रिय धुन सुनकर सबका मन आनन्द से झूम उठता था और अब इन जुआरियों के मुंह से निकली गाली-गलौजी भरे शब्द कर्णभेदी बनकर सबके दिल को क्षत-विक्षत कर जाते थे.  
घर पहुंचते ही उसने मां बाबूजी के चरण छूए. मां ने उसकी आरती उतारी और फिर उसे अंदर ले जाकर चौकी पर बिठाया. बेटा को करीब देख मां के शिथिल देह में भी गजब की स्फूर्ति आ गई थी. मशीन-सी वह दौड़ती फिरती बबुआ के लिए भोजन की तैयारी लग गई. उसे समझ नहीं आ रहा था कि आखिर क्या बनाएं. बबुआ की मनपसंद चीज तो कभी मकई की रोटी और घर का बना अचार हुआ करता किंतु, अब इतने दिनों से शहर में रह रहा है तो सबकुछ बदल गया होगा. पूराने जमाने का खाना भला अब उसे क्या सुहाएगा ? वह मन-ही-मन सोच रही थी किंतु, एक बार बबुआ से पूछ लेना ही सही लगा.
उसने पूछ ही लिया – “बबुआ ! तू क्या खाना पसन्द करेगा रे ?”
“मां मकई की रोटी बना दो ना. खाने के लिए मन तरस गया है. शहरों में ये सब कहां मिलती है.”
“वाह बबुआ ! तू थोड़ा भी ना बदला रे. मुझे लगा तू बाजारू सामान पसन्द करने लगा होगा, पर तू तो अब भी वैसा ही है.”
बबुआ की मां झटपट बेटा का मनपसन्द व्यंजन बना कर उसे अपने हाथों से खिलाने लगी. अपने जातीय स्वभाव से भला वह बाज कैसे आती. बोली – “बबुआ तू कितना सूख गया है रे ! समय पर खाता-पीता नहीं था क्या ?”
मां जबतक बेटे को अपने हाथों से खिला-पिला ना ले उसे बेटे के स्वास्थ की शिकायत बनी रहती है चाहे बेटा भीमसेन ही क्यों ना बन गया हो. कुछ देर तक बबुआ मां की ममतामयी गंगा में गोता लगाता रहा. फिर पिताजी से मेल-जोल कर वह गांव के दोस्तों के साथ भेंट-मुलाकात करने निकल गया.
शाम को वह घर लौटा. दोस्तों के साथ हुए उछल-कूद में वह थक गया था. सीधे बिस्तर पर निढाल होकर वह लेट गया. विचारों के सागर में गोता लगाते-लगाते कब उनकी आंखें लग गई पता ही नहीं चला.
उसकी मां भोजन की थाल लेकर आई और सिरहन के पास बैठकर बेटे के सर पर हाथ फेरने लगी. मां के हाथों का स्पर्श पाते ही बबुआ की आंखें फिट गई. मां ने उसके लिए आसन लगाया और वह भोजन करने बैठ गया. मां सामने बैठकर पंखा डुलाने लगी. मां को विचारमग्न देख उससे रहा नहीं गया. उसने पूछ ही लिया – “मां ! क्या सोच रही हो ? कोई परेशानी है क्या ?”
बबुआ की बात सुनकर उसकी मां अकचका गई थी. मुखमंडल पर हल्की-सी मुस्कान लाकर वह बोली – “नहीं.... नहीं, कुछ नहीं बबुआ. कोई परेशानी की बात नहीं है. तेरे जैसा बेटा जिसके पास हो उसे परेशानी किस बात का रे ? ईश्वर की कृपा से सबकुछ अच्छा है बबुआ. तुम्हें खाने में और कुछ चाहिए क्या ?”
”नहीं..नहीं मां और कुछ नहीं चाहिए. पेट एकदम भर गया.”
किंतु, बबुआ को लगा कि मां उससे कुछ छिपा रही है. कुछ तो बात जरूर है क्य़ोंकि, मां कुछ चिंतित भी लग रही थी. उसने कुरेदते हुए पूछा – “नहीं मां ! तुम मुझसे कुछ छिपा रही हो. बताओ ना आखिर बात क्या है ?”
“नहीं बाबू ऐसी कोई बात नहीं है रे. बस तुम्हारे ही बारे में सोच रही थी.” – बेटे को तसल्ली देते हुए मां बोली.
“मेरे बारे में .... मतलब ?” – जिज्ञासापूर्वक बबुआ ने पूछा.
मां जरा गंभीर होकर बोली – “हां बेटा ! हम सोच रहे थे कि तुम्हारी पढ़ाई-लिखाई पूरी हो गई है और तू अब सयान भी हो गया है इसीलिए किसी अच्छे खानदान की लड़की देख तेरा बियाह करा दूं. बस हमारी जिम्मेदारी निपट जाएगी और हमलोग भी तो बूढ़े हो चले हैं. गांव में तुम्हारे जोड़ीदार जितना भी था सबका बियाह हो गया है इसीलिए अब गांववाले भी हमें ताने भी मारने लगे हैं.”
अच्छा, तो ऐसी बात है. तुम चिंता ना करो. मैं गांववालों को समझा दूंगा. अब कोई आपलोगों को ताने नहीं मारेगा.
नहीं बबुआ ताने मारे या ना मारे लेकिन, तू अभी शादी ना करेगा तो कब करेगा ? उमर धरी हुई रहती है क्या ?
मां अब जमाना बदल गया है. जबतक कमाने लायक नहीं हो जाऊँ, कौन पूछेगा मुझे ?
तू हाँ तो कर लड़की वाले आधा पांव उठा के रखे हुए हैं.
मां किस लड़की की किस्मत फूटी है जो मुझ जैसे बेरोजगार से शादी करेगी ?
तू बेरोजगार कहां है रे ? तू इतना पढ़ा-लिखा है, जब चाहे अफ़सर बन सकता है. और हमारे इतने बड़े घर-गिरस्ती भी तो है. कौन संभलेगा इसे ?
मां के साथ ज्यादा तर्क-वितर्क करना उसे उचित नहीं लगा. सो जाने मैं है अभी भलाई थी. इसीलिए मां से कहा - जाओ मां सो जाओ. मैं भी जरा थका हूं, नींद आ रही है.
बबुआ पढ़ा-लिखा था. उसकी सोच, उसके नज़रिए काफी परिपक्व हो गया था. आधुनिकता के दौर में कैरियर के मायने को भला वह कैसे झूठला सकता था. मन किंकर्तव्यविमूढ़ के दलदल में फंसता जा रहा था. मां को तो नींद का बहाना बनाकर भेज दिया किंतु, नींद उससे कोसों दूर थी. उसे समझ नहीं आ रहा था कि क्या करूं. रातभर वह सो नहीं पाया. किसी अकल्पित भंवर में वह फंसता जा रहा था.
सुबह होते ही वह माता-पिता को समझाने में लग गया. जीवन में आनेवाली चुनौतियों से उन्हें अवगत कराया. दोनों ओर से काफी तर्क-वितर्क हुए. अंततः उनके माता-पिता को मानना पड़ा कि उनका बेटा सही है और उचित कदम उठा रहा है. अब समस्या थी गांववालों को समझाने की.
सुना था दीवारों के भी कान होते हैं किंतु, आज देख लिया. बबुआ बियाह नहीं करना चाहता है यह बात गांवभर में आग की तरह फैल गई. इसपर लोगों के मन में तरह-तरह के विचार उमड़ने लगे थे. कोई कहता किसी के प्यार में फंसा है, कोई कहता शहरिया छोकरी को बियाहेगा तो कोई कुछ और. समाज के अधज्ञानी ठेकेदारों को अपना दम्भ दिखाने का एक अच्छा मौका मिल गया था. कहते हैं कि अगर कोई नींद में है तो उसे जगाया जा सकता है किंतु, नींद में होने का अगर कोई नाटक करे तो भला उसे कौन जगा सकता ? समाज के ठेकेदारों की भी दशा कुछ वैसी ही थी. गांव में समाज की एक बैठक बुलाई गई. उसमें किसनलाल को भी बुलाया गया. बैठक के कारण का जब उसे पता चला तो वह थरथर कांपने लगा था. बैठक के मध्य से गांव का प्रधान उठा और अपना व्यंग्य बाण बबुआ के ऊपर साधते हुए बोला – गाँववालों ! आज हमें किसनलाल के बेटे बबुआ पर फख्र है. उसने उच्च तालिम पाकर गाँव का मान बढाया है, गाँववालों का माथा ऊँचा किया है. किंतु हमें खेद है कि वह गांव की परम्परा, मान - मर्यादा एवं निष्ठा के साथ खिलवाड़ करने जा रहा है. हमारे गांव में उसके हमउम्र के तमाम लड़के अपना-अपना घर बसा चुके हैं. उन्हें कोई एतराज नहीं हुआ. किंतु, बबुआ को अपनी पढ़ाई पर कुछ ज्यादा ही गुमान चढ़ आया है. हमारी परम्परा उसे औछी लगने लगी है. हम उनकी नज़र में रूढीवादी हैं, पूराने ख्यालात के हैं, देश-दुनिया की हमें समझ नहीं है. हमारी मर्जी से बियाह करने में उसने एतराज जाहिर किया है. यदि उसके इस अनुचित कदम को रोका नहीं गया तो कल के छोकरे अपनी मनमानी करते फिरेंगे. हम बड़ों की पूछ नहीं रहेगी. क्यों गांववालों आपलोगों की क्या राय है ? उसके इस अनुचित कदम को रोका जाए कि नहीं ?
हां....हां.....रोका जाए. अपनी नजर के सामने जीते जी ऐसा अनर्थ हम नहीं होने देंगे. – सभा में बैठे प्रधान के चमचों ने अपने हाथ ऊपर उठाते हुए एक स्वर में कहा.
प्रधान के स्वभाव व नियत से बाकि लोग परिचित थे. उन्होनें कोई प्रतिक्रिया नहीं दी.
देखिए आपलोगों को कोई गलतफहमी हुई है. ना मुझे अपनी पढ़ाई पर कोई गुमान है और ना ही मैं आपलोगों को रूढ़ीवादी और पूराने ख्यालात का मानता हूं. आप सभी मुझसे बड़े हैं और मैं आप सभी का सम्मान करता हूं. आपको दुनियादारी के मामलों में भी मुझसे कहीं ज्यादा अनुभव है. किंतु, आप सभी से मेरा एक अनुरोध है कि अभी के दौर में कैरियर काफी मायने रखता है. इसीलिए मुझे कुछ वक्त चाहिए और फिर मैं आप सबकी रजामंदी से ही शादी करूंगा. – अत्यंत विनम्रतापूर्वक बबुआ ने अपना पक्ष रखा.
समाज के ठेकेदारों को यह मंजूर कहां था ? दोनों तरफ से बहस होने लगी. एक तरफ आज के ग्रेजुएट तो दूसरी ओर समाज के पाखण्डी लोग. दोनों पक्षों में दमदार बहस छिड़ी. घंटे भर बीत गये पर बहस थम नहीं रही थी. बहस करने वालों से कहीं ज्यादा सुनने वाले मशगूल थे. समाज के ठेकेदार समाज को अपनी आडम्बरी चादर में ढके रखना चाहता था किंतु, बबुआ उस आडम्बरी चादर को चिरकर समाज का परिष्कृत रूप सबके सामने लाने का प्रयास कर रहा था. आखिर होना वही था. ग्रेजुएट बबुआ के सामने समाज के ठेकेदार कमजोर पड़ने लगे. बबुआ के तीक्ष्ण तर्क के आगे वे हथियार डालने पर विवश होने लगे. किंतु, अपने दम्भपूर्ण चेहरा को वे नैतिकता की आग में झुलसाना नहीं चाहते थे.
अब कोई और चारा नहीं देखकर गांव के प्रधान उठे और अपना ब्रह्मास्त्र छोड़ते हुए बोले – गाँववालों ! हमें खेद है कि आज हमारे सामने देवरूपी समाज की घोर निंदा हुई है और हम मूकदर्शक बने रहे. किंतु, इस निंदक के दुःसाहस को यूँ ही सह लेना हमारी मूर्खता होगी. अगर इसे कड़ी सबक नहीं सिखाया गया तो आये दिन लोग समाज को साग-बेंगन समझने लगेंगे. इसकी एहमियत धूल में मिल जाएगी. और ऐसा अनर्थ हम जीते जी नहीं होने देंगे. इसीलिए अपने बेटे की मूर्खता के कारण किसनलाल को सपरिवार समाज से बहिष्कृत किया जाता है. गांववालों के साथ उनका हुक्का पानी बंद.
प्रधान का निर्णय सुनते ही बबुआ की मां को मानो सांप सूंघ गई हो. प्रधान के पांव पकड़कर खूब गिड़गिड़ाई. पर सब व्यर्थ. सभी लोग अपने-अपने घर चल दिए. बबुआ आसमान से छँटते बादल की ओर निहारते हुए सोच रहा था कि काश ! इस पाखण्डी समाज से भी आडम्बरी चादर हट जाता तो समाज कितना प्यारा लगता. बिल्कुल नीले आसमान की तरह सुन्दर एवं मनमोहक.

समाप्त
         

@Govind
         


Saturday, 4 July 2015

पश्चाताप के आंसू

पश्चाताप के आँसू
दीनानाथ चौधरी उर्फ डी एन चौधरी, रेलवे से रिटायर्ड जूनियर इंजीनियर मरणासन्न अवस्था में सरकारी हॉस्पीटल में पड़ा था. बीच-बीच में हिचकियों से उसका पूरा तन बदन उछल उठता था. डॉक्टर सलाइन पर सलाइन लटकाए जा रहा था. उसे अचानक दिल का दौरा पड़ा था ऐसा सब कोई मानता था पर, सच कुछ और था. दिल का दौरा उसे अचानक नहीं बल्कि आज का अखबार देखने के बाद पड़ा था. आज का अखबार उसके लिए कड़वे सच का बवंडर लेकर आया था, जिसकी उसने ना कभी कल्पना की थी और ना ही कल्पना करना उसके वश की बात थी. एक ही साथ दो-दो कड़वे सच.
आखिर ऐसा क्या छपा था आज के न्यूज पेपर में, जिसने जीते-जागते चीते की तरह दहाड़ने वाले, आधुनिकता के सिपाही की कमर तोड़ दी थी ? उसे बिस्तर पर लाकर पटक दिया था और उसे जिन्दगी और मौत के बीच का पेंडुलम बना कर रख दिया था. सच कड़वा होता है, पर आज का सच उसके लिए कड़वे से भी कुछ अधिक था. इस अवस्था में ऐसे सच का सामना करने की उसके पास हिम्मत शेष नहीं बची थी. जिन्दगी में आशा की एक ही किरण शेष थी, जो अब अस्ताचल में धीरे धीरे निस्तेज होकर विलीन होने के कगार पर आ चुकी थी.  
आज उसके दृष्टिपटल पर बार बार रघुवर शर्मा की छवि उभर कर आ रही थी. उनकी पुरानी कही बातें ना चाहते हुए भी बार-बार काले बादलों की तरह दिमाग में उमड़-घुमड़ रही थी. अचानक फिर उसकी हिचकी तेज हो गई। सभी ने मिलकर उसके हाथ पैर दबाए रखा। डॉक्टर स्टैथौस्कोप सीने पर लगाकर धड़कन की गति मापने लगा. कुछ देर में फिर वह शांत पड़ गया. केवल साँसें चल रही थी. वह निर्जीव बेजान सा पड़ा था. आज अस्पताल में भी उसके पास अपना कोई नहीं था. हार्टअटैक आने पर उसके लेण्डलॉर्ड ने झटपट लाकर उसे सरकारी हॉस्पीटल में एडमिट करा दिया था। उसने ऐसा इसलिए नहीं किया था कि उसका अपना कोई नहीं था या उसके साथ लैंडलॉर्ड की सहानुभूति थी, बल्कि इसलिए कि कुछ अनहोनी होने पर कानूनी दांव पेंच से बचा जा सके.     
बात आज से करीब 10 - 12 साल पहले की है. तब उसकी पोस्टिंग रांची में थी. धुर्वा रांची में किराए के मकान में रहता था. सामने वाला मकान रघुवर शर्मा का था. वह किराए पर नहीं रहता था. उसका अपना मकान था, अपने सिद्धांत थे और अपनी परम्परा थी. अपना संस्कार, अपनी संस्कृति थी. यानी सबकुछ अपना था. वह स्कूल भी अपना था, जिसका वह प्रिन्सिपल था. उसके बच्चे दो थे - बेटी संजना और बेटा मनभरन शर्मा, जिसे घर में प्यार से मनु कहकर बुलाया जाता था. पत्नी राधिका बड़ी संस्कारी एवं धर्मभीरु थी. हर वक्त पूजा पाठ में लगी रहती थी. चौबीस एकादशी बारह पूर्णिमा और ना जाने महीने में कितनी बार उपवास रखती थी. सारे देवी देवता उससे खुश रहते. तभी तो उस परिवार का जीवन सुखमय था. ना कोई आकस्मिक विपत्ति आयी थी और ना कोई बडी उलझन. जीवन की गाड़ी बड़े मजे में द्रुत गति से चल रही थी.
पर डी एन चौधरी की उस परिवार से कभी बनीं नहीं. दोनों के बीच कोई पुरानी दुश्मनी तो नहीं थी पर, दोनों की विचारधाराएं अलग अलग जरूर थी. डी एन चौधरी खुद को बड़ा मॉडर्न किस्म का इंसान समझता था एकदम लेटेस्ट वर्जन वाला. उसके पास कुछ भी अपना नहीं था. नाम था दीनानाथ चौधरी, पर उसे यह नाम बड़ा पुराने ज़माने का लगता. लेटेस्ट वर्जन वाली थॉट्स में यह नाम सटीक नहीं बैठ रहा था. इसीलिए उसने अपना नाम बदलकर डी एन चौधरी कर लिया था. एक बेटी थी सुनैना जिसका नाम बदल कर अब ‘ब्युटी’ हो गया था. पत्नी की आकस्मिक मौत हो चुकी थी (या मार दिया गया था) जो अब भी लोगों के बीच रहस्य का विषय था. अब पत्नी कहने को कोई अपनी थी नहीं. बस उसका जब मन बहुत मचलता तो एलिसा के पास से रिफ्रेश होकर लौट आता. एलिसा भी उन औरतों में से एक थी जिसे अलग-अलग मर्दों की बाहें प्यारी लगती थी. अपने पति से उसका अभी तक कानूनन तलाक तो नहीं हुआ था पर, म्युचुअल डायवर्स के साथ वह एक किराए के घर में अकेले रह रही थी. कई मर्दों के साथ उसके जिस्मानी संबंध थे. डी एन चौधरी के साथ उसका कुछ ज्यादा ही अटैचमेंट था. कई बार चौधरी ने लाइफ पार्टनर बनने तक का प्रस्ताव भी रख दिया था पर वह फिर एक ओर गलती करने के लिए तैयार नहीं थी. वह एक मर्द की बांदी बनकर नहीं रहना चाहती थी.
यहाँ डी एन चौधरी का सबकुछ बिल्कुल पराया था, सिवाय अपनी बेटी के. घर पराया था. शहर पराया था. नाम भी अब मॉडीफाई होकर पराया-सा बन गया था. संस्कार भी अपना नहीं रहा था या यूं कह लें उसे वह रखना ही नहीं चाहता था. अगर उसे वेस्टर्न कल्चर का कट्टर प्रचारक कहा जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी. पहनावे ले लेकर जुबान तक वेस्टर्न कल्चर के गाढ़े रंग में रंग चुका था. अपना धर्म, अपनी परम्परा, अपनी संस्कृति से उसे चिढ़ सी हो गयी थी. धर्म-कर्म सब उसकी नज़र में ढकोसले थे जो समाज को पीछे धकेलने वाले थे. धर्म-कर्म उसे लोगों की मानसिकता को संकुचित करने वाला लगता था. वह तो प्रगति पथ का रोड़ा था तो भला उसे वह अपने कंधों पर बोझ बनाकर क्यों ढोता ? 
सुबह-सुबह शर्मा जी के घर से आने वाली आरती की ध्वनि उसे गालियों सी लगती. कई बार वह मन ही मन सुबह की नींद खराब करने के लिए उसे गालियां भी दे चुका था. शर्मा जी को वह दकियानूसी सोच वाला पढ़ा-लिखा गंवार मानता था. उससे कहीं ज्यादा चिढ़  उसे तब होती जब शर्माजी संस्कारों की पगडंडी पर अपने बच्चों को चलने के लिए ट्रेण्ड करते. उन्हें रामायण, गीता के उपदेशों की कसौटी पर कसकर जीवन जीने का संदेश देते. हर कार्य नैतिकता की आग में तपाकर करने की नसीहत देते. जिम्मेदारियों के धागे में बांधकर उसे अपने मन मुताबिक चलाने का प्रयास करते.
डी एन चौधरी ने कई बार उन्हें अपने पास बुलाकर झाड़ भी पिलाई थी. वे कहा करते कि शर्मा जी आप अपने बच्चों की जिंदगी चौपट कर रहे हैं. उनका बचपन मार रहे हैं. उनकी आजादी छीन रहे हैं. उन्हें अपने जैसा बनाने का प्रयास मत करिये. उनके अपने विचार हैं. वे अपने तरीके से जीना जानते हैं. उनके अरमानों का कत्ल मत करिए. आप अपनी परंपरा, संस्कार, रीति-रिवाज उनपर जबरदस्ती थोपने की भूल मत करिए वर्ना एक दिन वह आपसे बगावत कर बैठेंगे.     
चौधरी की इन नसीहतों को सुनकर शर्माजी बस इतना ही कहते – “अपने परिवार को चलाने ले लिए मुझे आपकी नसीहत की जरूरत नहीं है. बेहतर इसी में है कि आप दूसरों के कॉलर छोड़कर अपना कॉलर ठीक कर लें.”
वैसे शर्माजी थे बड़े ही भले किस्म के इंसान. ना कभी किसी की बुराई के बारे में सोचते और ना ही किसी का बुरा करते. उन्होनें कई बार चौधरी जी को समझाने और सही राह दिखाने का प्रयास भी किया था. अपनी परम्परा का महत्व समझाया था. पर चौधरी भी था अपने किस्म का विरला इंसान था. विलायती ठाठ बाट का रंग उसपर ऐसा चढ़ा था कि उतरने का नाम ही नहीं ले रहा था.
उसकी बेटी ब्युटी बड़ी हो रही थी. कॉलेज गोइंग गर्ल तो थी ही पर, अभी से ही उसे बार जाने की लत भी लग गई थी. लड़कों के साथ घूमना-फिरना तक तो ठीक था पर, देर रात लड़कों के साथ बार से शराब पीकर वापस आना, पिता की गैरहाजिरी में लड़कों को अपने घर बुलाना शर्मा जी को कुछ अच्छा नहीं लगता था. कहते हैं न कि एक सड़ी मछली पूरे तालाब को गंदा कर देती है. यही डर शर्मा जी को भी कभी-कभार परेशान करता था. आखिर उसके घर पर भी तो जवान बेटा – बेटी थे. भले ही उसने सुसंस्कारों की घुट्टी उन्हें गले तक भरकर पिलाई थी, पर ऐसा भी कोई गारंटी सर्टिफिकेट उसके पास नहीं था कि उसके बच्चों पर गलत संगत का असर बिल्कुल नहीं पड़ेगा.
एक दिन उसने चौधरी को आगाह किया – “देखिए, चौधरी जी ! ब्युटी को उतनी आज़ादी देना भी ठीक नहीं है. उसे बेलगाम मत होने दीजिए. वर्ना एक दिन पश्चाताप के अलावा और कुछ भी नहीं बचेगा आप के पास.”  
शर्माजी की इस बात पर चौधरी काफी भड़का था और खूब खरी-खोटी सुनाई थी. नेरो माइंडेड से लेकर अंग्रेजी की न जाने कितनी उल्टी-सीधी उपाधियां उसे दे डाली थी. बेचारे शर्मा भी चुपचाप सुनकर वहां से चले गए थे. उसी दिन से दोनों के बीच बोलचाल बंद हो गई थी. दोनों के बीच मानो ना टूटने वाली पत्थर की दीवार-सी खड़ी हो गई थी. इधर शर्मा जी अपनी दुनिया में व्यस्त हो गए और उधर चौधरी भी अपने जहान में मशरूप हो गया.  
शर्मा जी ने अपने बच्चों को आगे की पढ़ाई करने दिल्ली भेज दिया था और उधर चौधरी जी ने भी ब्युटी को मुम्बई भेज दिया था मॉडलिंग के लिए.
समय बीतता गया. शर्मा जी का सबकुछ अपना था. अपना घर, अपने सिद्धांत, अपनी परम्परा, अपना संस्कार. अपनी संस्कृति, अपना स्कूल. उसका सबकुछ अपना था इसीलिए वह अपने घर पर ही अपना बनकर रह गया. उधर चौधरी का कुछ समय बाद वहाँ से बनारस ट्रांसफर हो गया था. यहां भी उसका सबकुछ पराया था. पराया शहर, पराया मकान, पराए लोग, पराई दुनिया. सबकुछ पराया था इसीलिए वह कभी किसी का अपना नहीं हो सका.
आज के उस न्यूज पेपर से एक नहीं दो-दो तीर निकलकर उसके सीने में बेरहमी से आ घुसे थे. एक अपनी बेटी के साथ सीना तानकर खड़े शर्मा की न्यूज पेपर पर छपी तस्वीर और दूसरी पुलिस के गिरफ्त में काले स्कॉर्फ से मुंह ढ़के ब्युटी चौधरी की तस्वीर. दोनों ही तस्वीरें आज के न्यूज पेपर में छपी थीं. पर दोनों ही तस्वीरों के प्रतिबिंब में आकाश-जमीन का फर्क था. संजना का चेहरा गर्व से दीप्तिमान था तो उधर ब्युटी का चेहरा शर्म और ग्लानि से कालिमामय था. एक ने अपने कुल खानदान का नाम रौशन किया था तो दूसरी ने कलंकित.  
शर्मा जी आज फूले नहीं समा रहे थे. उनकी बेटी ने अखिल भारतीय सिविल सर्विस एग्जाम में टॉप 10 में जगह बनाकर अपने माता पिता का नाम रौशन कर दिया था. उसने सफलता की बुलंदियों को छूआ था. शर्मा जी के लिए इससे बढ़कर और खुशी की बात क्या हो सकती थी ? उनका सीना दो इंच और चौड़ा हो गया था. उनकी दिली तमन्ना पूरी हो गई थी.
उधर ब्युटी चौधरी सेक्स रैकेट चलाने के जुर्म में पुलिस के हत्थे चढ़ गई थी.
पुलिस ने खुलासा किया कि मुंबई जाकर उसने मॉडलिंग के लिए काफी संघर्ष किया और दर- दर की खाक छानती रही. पर मुंबई नगरी ठहरी माया की नगरी वह इतनी आसानी से किसी पर मेहरबान कहां होती है ? अंत में थक हार कर उसने जिस्मफरोशी का काम शुरू कर दिया था. उसने अपने पिताजी को भी अंधेरे में रखा था. वह हमेशा चौधरी को दिलासा देती रही कि बहुत जल्द मैं अपने मकसद में कामयाब हो जाऊंगी. पर कभी ना कभी तो उसका असली चेहरा दुनिया के सामने आना ही था. किंतु आज की इस घटना को एक संयोग ही कहा जा सकता है कि दोनों के कर्म का फल एक ही साथ दुनिया के सामने आया.
चौधरी ने एक बार फिर दम लगाकर उठने का प्रयास किया, पर आज उसे बेबसी के आलम ने इस प्रकार से जकड़ा था कि उससे मुक्त होना उसके लिए आसान नहीं था. उसे शर्मा जी की बात फिर याद हो आई -  “देखिए चौधरी जी ! ब्युटी को उतनी आज़ादी देना भी ठीक नहीं है. उसे बेलगाम मत होने दीजिए. वर्ना एक दिन पश्चाताप के अलावा और कुछ भी नहीं बचेगा आप के पास.”  
उसने पीने के लिए पानी मांगा. शर्मा जी की वह बात फिर याद हो आई - अपने परिवार को चलाने ले लिए मुझे आपकी नसीहत की जरूरत नहीं है. बेहतर इसी में है कि आप दूसरों का कॉलर छोड़कर अपना कॉलर ठीक कर लें.”
उसे शर्मा जी की बातों की सच्चाई का अहसास हो गया था. उसका मन ग्लानि से भर उठा. पश्चाताप के आंसू रह-रह कर गालों के नीचे ढुलक रहे थे और बिस्तर भींग रहा था. किंतु, अब कुछ नहीं किया जा सकता था. अब पछताय क्या होत जब चिड़ियां चुग गई खेत. अब सिर पीटने के अलावा उसके पास कोई चारा नहीं था. वेस्टर्न कल्चर की जिस स्वच्छंद फसल को उसने भारतीय जमीन पर उगाने का प्रयास किया था, वह यहां की मिट्टी में उग नहीं पाई, बल्कि मिट्टी में लोट पोट होकर अपना स्वत्व विलीन कर चुकी थी.  

समाप्त


Tuesday, 23 June 2015

चिड़िया

चिड़िया

चिड़िया रानी चिड़िया रानी
मुझे तू लगती बड़ी सुहानी

पेड़ों पर खूब मजे से रहती है
सुन्दर सुन्दर घोंसला बनाती है
गगन में पंख फैलाकर उड़ती है
थककर पेड़ों पर आ बैठती है
नानी सुनाती तेरी सुन्दर कहानी

चिड़िया रानी चिड़िया रानी
मुझे तू लगती बड़ी सुहानी

            दिनभर दाना चुन चुन लाती है
            नन्हें नन्हें बच्चों को खिलाती है
            जाड़े हो या गर्मी खुले बदन सहती है
            बरसात से भी नहीं कभी घबराती है
            दुनिया में चलती खूब तेरी मनमानी
चिड़िया रानी चिड़िया रानी
मुझे तू लगती बड़ी सुहानी





नयन से नयन

नयन से नयन मिली तो क्या बात हुई,
दिल पे उसने दस्तक दी तो क्या बात हुई.
लफ़्जों के मोहताज़ कहां हुआ करते हैं हम,
इशारों में ही दिल की बात बता दी तो क्या बात हुई. 

Monday, 18 May 2015

शिकवे शिकायत का झूठा इल्जाम,

शिकवे शिकायत का झूठा इल्जाम,
यू ओरो को मैं न कभी देता हूँ।
वक्त की नजाकत को देख बस,
खुद को ही बदल लेता हूँ।